एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका, व्यक्तिगत आजादी, जीने और गरिमा की सुरक्षा खत्म होने समेत ये दलीलें दी गईं
नई दिल्ली। एससी/एसटी एक्ट की धाराओं की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। तमाम धार्मिक स्थलों का केस लड़ रहे वकील विष्णु शंकर जैन के जरिए बृजभूषण सैनी और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर एससी/एसटी एक्ट को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताकर जमानत और गिरफ्तारी से संबंधित धारा 18-ए हटाने की मांग की गई है। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच इस याचिका पर सुनवाई करने वाली है।
याचिका में कहा गया है कि अंतरिम राहत के तहत एससी/एसटी एक्ट की धारा 8, 18, 18-ए और 19 पर रोक लगाई जाए। याचिका में व्यक्तिगत आजादी, जीने और गरिमा की सुरक्षा का हवाला देकर केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि इन प्रावधानों में से कुछ संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 में दिए गए समानता, जीवन जीने, व्यक्तिगत आजादी और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन करते हैं। याचिका में अपील की गई है कि पुलिस को एससी/एसटी एक्ट में एफआईआर और गिरफ्तारी की प्रक्रिया के संबंध में दिशानिर्देश दिया जाए।
याचिका में एससी/एसटी एक्ट की धारा 18-ए को चुनौती देते हुए कहा गया है कि इस प्रावधान के तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी नहीं है। गिरफ्तारी के लिए भी पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं। याचिका में कहा गया है कि इससे व्यक्तिगत आजादी प्रभावित हो सकती है। याचिका में साल 2018 के संशोधन के जरिए एससी/एसटी एक्ट में धारा 18-ए जोड़ने को सुप्रीम कोर्ट के उसी साल के एक फैसले के संदर्भ में चुनौती देते हुए कहा गया है कि संसद ने कोर्ट के निर्देशों को असर विहीन करने के लिए प्रावधान किया। धारा 18 के खिलाफ कहा गया है कि ये अग्रिम जमानत को रोकता है। इससे झूठे आरोप में व्यक्ति की आजादी प्रभावित होती है। वहीं, एससी/एसटी एक्ट की धारा 19 के तहत दोषसिद्ध मामलों में परिवीक्षा की राहत न होने को भी चुनौती दी गई है। याचिका में दावा किया गया है कि इसके कुछ प्रावधान के दुरुपयोग से निर्दोषों की गिरफ्तारी और लंबे वक्त तक मुकदमे के हालात बन सकते हैं।
