सिर्फ परिवार की आमदनी के आधार पर क्रीमी लेयर को तय नहीं किया जा सकता, सुप्रीम कोर्ट का ओबीसी आरक्षण पर बड़ा फैसला
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने एक अहम फैसले में कहा है कि सिर्फ आमदनी के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई ओबीसी उम्मीदवार क्रीमी लेयर के दायरे में आता है या नहीं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि पारिवारिक आय के आधार पर ओबीसी की क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट बेंच का कहना है कि अगर किसी के माता-पिता सरकारी नौकरी में हैं और उनकी वार्षिक आय 8 लाख से ज्यादा है तो उसे क्रीमी लेयर में नहीं जोड़ा जाएगा। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में कृषि से होने वाली आय को भी पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।
शीर्ष अदालत ने इस फैसले में 2004 के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के उस पत्र के पैरा 9 को अमान्य करार दिया है जिसमें बैंक, प्राइवेट सेक्टर या पीएसयू कर्मचारियों की सैलरी क्रीमी लेयर में शामिल करने की बात कही गई थी। अदालत ने कहा कि जब तक पीएसयू या प्राइवेट पोस्ट की सरकारी ग्रुप 3 या 4 के साथ समकक्षता तय नहीं होती, तब तक केवल 1993 के मूल आदेश लागू रहेंगे। इस फैसले से उन ओबीसी उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिलेगी जिन्हें क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण के लाभ से वंचित रखा गया।
कोर्ट ने फैसले को रेट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से) लागू करने का निर्देश दिया है। इस आदेश को लागू करने के लिए डीओपीटी को 6 महीने का समय दिया गया है। ऐसे लोग जो सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन सही कैडर या पद में नहीं पहुंच पाए उनके लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त पद बनाए जाएंगे, ताकि अन्य कैटेगरी के कर्मचारियों की सीनियरिटी प्रभावित न हो। बता दें कि क्रीमी लेयर में समुदाय के आर्थिक रूप से मजबूत लोग आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा सहनी बनाम भारत सरकार मामले (1992) में कहा था आरक्षण का समुदाय के गरीब और पिछड़े लोगों तक पहुंचना चाहिए।
