April 18, 2026

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सब्सक्रिप्शन जाल में फंस रहे 67 प्रतिशत ग्राहक, App खरीदारी के समय हिडन चार्ज की वजह से देना पड़ता है पैसा

साइबर सिक्योरिटी और कंज्यूमर सेफ्टी हमेशा से दुनिया भर के देशों के लिए एक अहम मुद्दा है। ऐसे में सरकारें लगातार इसमें लगी रहती है कि कैसे लोगों को सुरक्षित रखा जाए। हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है कि 67% कंज्यूमर्स सब्सक्रिप्शन ट्रैप में फंसे हैं। आपको बता दें कि हाल ही में लोकलसर्कल्स ने एक सर्वे किया, जिसमें में शामिल लगभग 67 प्रतिशत कंज्यूमर्स ने ऐप या सॉफ्टवेयर-ए-ए-सर्विस प्लेटफार्म से कोई प्रोडक्ट सर्विस खरीदा है तो वे अक्सर एक सब्सक्रिप्शन ट्रैप बन जाता है। इसके अलावा 71 % लोगों ने बताया कि उन्हें हिडेन चार्ज देना पड़ा ,जिसे खरीदारी के बाद देना पड़ा।

हजारों लोग बने सर्वे का हिस्सा

  • लोकलसर्कल्स के सर्वे में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया था। रिपोर्ट की मानें तो भारत के 331 जिलों के ऐप और सॉफ्टवेयर सब्सक्रिप्शन यूजर्स से लगभग 44000 से ज्यादा रिएक्शन आए हैं।
  • सरकार ने 13 तरह के डार्क पैटर्न की पहचान की है, जिसमें फॉल्स अरजेंसी , बास्केट स्नीकिंग, कन्फर्म शेमिंग, ऑर्सिड एक्शन, सब्सक्रिप्शन ट्रैप, इंटरफेस इंटरफेरेंस, बैट एंड स्विच, ड्रिप प्राइसिंग, खराब विज्ञापन, नैगिंग शामिल हैं।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि SaaS बिलिंग और दुष्ट मैलवेयर को डार्क पैटर्न के रूप में पहचाना गया है।
  • इसका निष्कर्ष ‘डार्क पैटर्न’ से संबंधित हैं। ये वेबसाइटों और ऐप्स द्वारा उपयोग की जाने वाली तरकीबें हैं, जो कंज्यूमर्स को उत्पाद या सेवाएं खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं।

एआई भी है जिम्मेदार

  • रिपोर्ट में ये भी पता चला है कि इस गहन समस्या के लिए एआई भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। आपको बता दें कि एआई चैटबॉट ऐप्स की एक नई पीढ़ी यूजर्स को महंगी सर्विस की ओर ले जा रही है।
  • अब देखना है कि सर्वे एजेंसी कबइन निष्कर्षों को सरकार के सामने पेश करेगा। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्कैमर्स चैटजीपीटीके के सॉफ़्टवेयर के साथ आने वाले ऐप को स्टोर पर ला रहे हैं।इन ऐप्स में अक्सर आपको हाई सब्सक्रिप्शन फी देनी होती है
  • सर्वे में शामिल लगभग 50 प्रतिशत कंज्यूमर ने ‘बेट और स्विच’ डार्क पैटर्न का अनुभव किया। वहीं लगभग 25 प्रतिशत कंज्यूमर्स ने कुछ ऐप्स में मैलवेयर का भी अनुभव किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि डार्क वेब पर 815 मिलियन का आधार डेटा बिक्री पर है।

NEWS SOURCE : jagran