February 16, 2026

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क्या है कांग्रेस के दौर में बना अफस्पा कानून?, केंद्र सरकार ने नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश इसकी मियाद है बढ़ाई

नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार ने नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में AFSPA अफस्पा एक्ट की मियाद और बढ़ा दी है। अफस्पा यानी आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट। सेना और अर्धसैनिक बलों के जवानों के लिए ये कानून 11 सितंबर 1958 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संसद से पास कराया था। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में आतंकवादी और देशविरोधी गतिविधियां करने वालों पर सेना और अर्धसैनिक बलों की प्रभावी कार्रवाई के लिए अफस्पा कानून लागू भी किया गया। मोदी सरकार ने कई राज्यों से अफस्पा कानून को हटाया भी है। इस कानून को रद्द करने की मांग भी तमाम मानवाधिकार संगठन समय-समय पर करते रहे हैं। अब आपको बताते हैं कि अफस्पा कानून से सेना और अर्धसैनिक बलों को क्या अधिकार मिल जाते हैं?

अफस्पा कानून को किसी जगह या राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित करने के बाद लागू किया जाता है। अशांत क्षेत्र घोषित करने का अधिकार केंद्र सरकार, संबंधित राज्यों के गवर्नर और केंद्र शासित प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर को है। इसके लिए अफस्पा कानून की धारा 3 के तहत अधिसूचना जारी की जाती है। अफस्पा कानून जहां लागू होता है, वहां सेना और अर्धसैनिक बल के जवानों को 5 या इससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगाने का हक मिल जाता है। बिना इस कानून के प्रशासन के पास ये अधिकार होता है। इसके अलावा अफस्पा के तहत सशस्त्र बलों को ये हक भी मिल जाता है कि अगर कोई कानून का उल्लंघन कर रहा है, तो चेतावनी देने के बाद उसे गोली भी मार सकते हैं। अफस्पा कानून के तहत ऐसे में जवानों पर हत्या का केस नहीं हो सकता।

अफस्पा के तहत शक होने पर सेना और अर्धसैनिक बल संबंधित शख्स को बिना वॉरंट गिरफ्तार कर सकते हैं। इसके अलावा बिना वॉरंट कहीं भी तलाशी ले सकते हैं। किसी भी परिसर में कार्रवाई के लिए बिना मंजूरी या वॉरंट के सेना और अर्धसैनिक बल प्रवेश भी कर सकते हैं। ऐसे में परिसर में रहने वाले उनके खिलाफ कोर्ट नहीं जा सकते। इन्हीं सब प्रावधानों के कारण मानवाधिकार संगठन अफस्पा AFSPA का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि इससे निजता और संविधान के तहत मिली सुरक्षा की गारंटी खत्म होती है।