बिहार में अब तक सिर्फ एक विपक्षी दल ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर 10 दावे और आपत्तियां जताईं, क्या चुनाव आयोग पर बिना सबूत लगाया जा रहा नाम काटने का आरोप?
नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में वोटरों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया है। एसआईआर के पहले चरण में चुनाव आयोग ने 65.64 लाख लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से काट दिए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि इनमें मृत, स्थायी तौर पर दूसरी जगह चले गए और एक से ज्यादा जगह दर्ज वोटर हैं। वहीं, विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी के इशारे पर चुनाव आयोग ने 65 लाख से ज्यादा वोटरों के नाम काटे हैं। बिहार में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर दावे और आपत्ति करने के साथ ही नए वोटरों के नाम चढ़ाने का काम 1 सितंबर तक होगा। इसमें सिर्फ 6 दिन बचे हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की तरफ से मंगलवार तक सिर्फ 10 दावे और आपत्तियां चुनाव आयोग को दी गई हैं।
चुनाव आयोग ने बताया है कि 1 अगस्त 2025 से 26 अगस्त सुबह 10 बजे तक बिहार में सिर्फ सीपीआई-एमएल की तरफ से 10 दावे और आपत्तियां दर्ज कराई गईं। जबकि, आरजेडी और कांग्रेस समेत किसी भी अन्य दल ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर कोई दावा या आपत्ति नहीं की है। चुनाव आयोग ने बताया है कि 162453 लोगों ने खुद दावे और आपत्तियां की हैं। इनमें से 26 अगस्त तक 17516 दावों और आपत्तियों का निस्तारण किया गया। जबकि, मंगलवार तक 433214 लोगों ने नए वोटर के तहत नाम जोड़ने के लिए आवेदन दिया था। इनमें से चुनाव आयोग ने किसी के आवेदन का निस्तारण नहीं किया है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि बड़े विपक्षी दल ये हल्ला तो मचा रहे हैं कि चुनाव आयोग ने 65 लाख वोटरों के नाम गलत काट दिए, लेकिन अब तक इन दलों ने कोई दावा या आपत्ति क्यों नहीं दी?
बिहार में एसआईआर के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों राज्य के सभी 12 राजनीतिक दलों को भी पार्टी बनाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने ये सवाल उठाया था कि आखिर बिहार के राजनीतिक दलों की तरफ से लाखों बीएलए नियुक्त करने के बाद भी दावा और आपत्ति क्यों नहीं दी जा रही? कोर्ट ने ऑनलाइन के अलावा बिहार चुनाव आयोग, जिलों के मुख्य चुनाव अधिकारी दफ्तर और बीडीओ दफ्तर में भी वोटर लिस्ट लगाने का आदेश दिया था। चुनाव आयोग ने इस पर लिस्ट लगाई भी है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ये भी आदेश दिया था कि वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए चुनाव आयोग की तरफ से मांगे गए 11 दस्तावेजों के अलावा आधार कार्ड भी मान्य है। इनमें से सिर्फ 1 दस्तावेज ही वोटर के नाते नाम जुड़वाने के लिए देना है। इसके बावजूद ये नहीं दिख रहा कि जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, उनमें से बड़ी तादाद में लोग बिहार की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर दावे और आपत्तियां कर रहे हैं! ऐसे में एक और बड़ा सवाल ये है कि क्या बिहार के विपक्षी दल बिना किसी सबूत के ही चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने जान-बूझकर वोटरों के नाम काटे हैं?
