कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार : लोकतंत्र का प्राण, राष्ट्रचेतना का अमर प्रहरी
रविन्द्र बंसल –
“जब सत्ता निरंकुश होने लगे, जब जनस्वर दबने लगे, जब सत्य पर असत्य का आवरण चढ़ने लगे, तब इतिहास किसी योद्धा की प्रतीक्षा नहीं करता—वह एक निर्भीक पत्रकार की कलम की प्रतीक्षा करता है।”
सृष्टि में शब्द सबसे बड़ी शक्ति है। शब्द विचारों को जन्म देते हैं, विचार समाज का निर्माण करते हैं और समाज राष्ट्र का स्वरूप निर्धारित करता है। यही कारण है कि कलम को सदैव तलवार से अधिक शक्तिशाली माना गया है। तलवार केवल शरीर को परास्त कर सकती है, किंतु कलम विचारों की क्रांति उत्पन्न करती है। एक कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार इसी क्रांति का संवाहक होता है। वह समाचारों का व्यापारी नहीं, बल्कि सत्य का साधक, समाज का सजग प्रहरी और लोकतंत्र का जीवंत प्राण है।
पत्रकारिता का उद्देश्य कभी भी केवल घटनाओं का संकलन नहीं रहा। उसका मूल स्वर जनजागरण, जनचेतना और जनकल्याण है। जब समाज दिशाहीन होने लगता है, तब पत्रकारिता उसे दिशा देती है; जब व्यवस्था संवेदनहीन हो जाती है, तब पत्रकारिता उसे आईना दिखाती है; और जब जनता की आवाज़ सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँचती, तब पत्रकारिता ही उस आवाज़ को शब्द देती है। इसलिए कहा गया है कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संसद की बहसों से पहले जनता की चेतना में बसती है, और उस चेतना को जागृत करने का दायित्व पत्रकार निभाता है।
सच्चा पत्रकार सत्ता का विरोधी नहीं होता, वह अन्याय का विरोधी होता है। वह सरकार का शत्रु नहीं, बल्कि समाज का हितैषी होता है। जहाँ जनहित के कार्य होते हैं, वहाँ वह प्रशंसा करने में संकोच नहीं करता; और जहाँ भ्रष्टाचार, अत्याचार या अनियमितता दिखाई देती है, वहाँ बिना किसी भय या पक्षपात के प्रश्न पूछता है। उसकी निष्पक्षता ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है।
पत्रकार की कलम केवल शब्द नहीं लिखती, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास का प्रारूप तैयार करती है। आज जो समाचार है, वही कल इतिहास का दस्तावेज़ बन जाता है। इसलिए पत्रकार का प्रत्येक शब्द उत्तरदायित्व से भरा होता है। उसकी एक भूल किसी निर्दोष की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा सकती है, जबकि उसकी एक सत्यनिष्ठ रिपोर्ट किसी पीड़ित को न्याय दिला सकती है। इसी कारण पत्रकारिता में सबसे बड़ा मूल्य सत्य है—न कि सनसनी, न लोकप्रियता और न ही तात्कालिक लाभ।
कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार का जीवन संघर्षों से भरा होता है। कभी सत्ता का दबाव, कभी आर्थिक प्रलोभन, कभी सामाजिक विरोध, तो कभी व्यक्तिगत सुरक्षा का संकट—ये सब उसकी परीक्षा लेते हैं। किंतु वही पत्रकार अमर होता है जिसकी कलम इन परिस्थितियों के सामने झुकती नहीं। उसकी निष्ठा पुरस्कारों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से मापी जाती है। वह जानता है कि यदि उसकी लेखनी बिक गई, तो समाज का विश्वास टूट जाएगा; और यदि समाज का विश्वास टूट गया, तो लोकतंत्र का आधार भी डगमगा जाएगा।
आज डिजिटल युग में सूचना का प्रवाह अभूतपूर्व है। कुछ क्षणों में लाखों लोगों तक कोई भी सूचना पहुँच जाती है। ऐसी स्थिति में पत्रकार का उत्तरदायित्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उसे गति और सत्य के बीच संतुलन स्थापित करना होता है। सबसे पहले समाचार देने की होड़ से अधिक महत्वपूर्ण है सबसे सही समाचार देना। यही पत्रकारिता की मर्यादा है और यही उसकी प्रतिष्ठा।
भारतीय पत्रकारिता की परंपरा त्याग, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति से अनुप्राणित रही है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक पत्रकारों ने जेल की यातनाएँ सहीं, आर्थिक कष्ट झेले, समाचार पत्र बंद हुए, लेकिन उनकी कलम नहीं रुकी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म है। उनके आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में थे।
आज आवश्यकता ऐसे पत्रकारों की है जिनकी लेखनी सत्य की साधना करे, जिनके शब्द समाज को जोड़ें, जिनकी दृष्टि कमजोर और वंचित वर्ग तक पहुँचे, जिनका साहस सत्ता से प्रश्न पूछ सके और जिनकी संवेदना मानवता की रक्षा करे। पत्रकारिता तब तक महान है, जब तक वह जनहित की प्रहरी है; अन्यथा वह केवल सूचना का व्यवसाय बनकर रह जाती है।
समापन में केवल इतना ही—
पत्रकार दीपक है, जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। पत्रकार दर्पण है, जो समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाता है। पत्रकार प्रहरी है, जो लोकतंत्र की चौखट पर जागता रहता है। पत्रकार वह स्वर है, जिसे खरीदा नहीं जा सकता; वह वह अंतरात्मा है, जिसे दबाया नहीं जा सकता।
जिस दिन किसी पत्रकार की कलम सत्य के लिए चलना बंद कर देगी, उसी दिन लोकतंत्र की साँसें भारी होने लगेंगी। और जिस दिन एक कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर लिखेगा, उसी दिन आशा का नया सूर्य उदित होगा।
इसलिए पत्रकार बनना सरल है, पर कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार बनना तपस्या है। यह तपस्या त्याग माँगती है, चरित्र माँगती है, साहस माँगती है और सबसे बढ़कर राष्ट्र तथा समाज के प्रति अटूट समर्पण माँगती है। ऐसी कलम ही युग बदलती है, इतिहास लिखती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्य का प्रकाशस्तंभ बन जाती है।
