एक प्रेसवार्ता से पंचायतों तक पहुंची लोनी की सियासत
5 सितंबर की घटना के बाद आमने-सामने आए राजनीतिक खेमे, 13 और 20 सितंबर को अलग-अलग पंचायतों में दिखी ताकत—विवाद अब गांवों से निकलकर भाजपा की राजनीति के केंद्र तक
रविन्द्र बंसल,
लोनी। एक प्रेसवार्ता से शुरू हुआ विवाद अब लोनी के गांवों तक पहुंच चुका है। 5 सितंबर को रेस्टोरेंट में हुई कहासुनी के बाद विधायक नंदकिशोर गुर्जर पर कथित अभद्र भाषा के आरोप लगे तो विधायक ने आरोपों से इनकार किया। इसके बाद शिकायत, पंचायत और लामबंदी का सिलसिला शुरू हुआ। 13 सितंबर को सिरौली में विधायक के समर्थन और रिस्तल में विरोध में पंचायत हुई। 20 सितंबर को गढ़ी कटैया में विरोध के स्वर उठे तो उसी दिन बाग राणप में विधायक समर्थक पंचायत के जरिए सामने आए। यानी एक विवाद अब दो राजनीतिक स्वरों और कई गांवों की पंचायतों में बंटता दिखाई दे रहा है।
विवाद की पृष्ठभूमि में 2 सितंबर की टोली मोहल्ला घटना भी रही। हिंदू रक्षा दल से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट के मामले में मुकदमा दर्ज हुआ और हाजी सलमान प्रकरण चर्चा में आया। इसी पृष्ठभूमि के बाद 5 सितंबर की प्रेसवार्ता हुई। विधायक के अनुसार उन्हें वहां कुछ लोगों के मौजूद होने की सूचना मिली थी और इसी को लेकर कहासुनी हुई। दूसरी ओर, उनके कथित व्यवहार को लेकर आपत्ति जताई गई। दोनों पक्षों के दावे अलग हैं और इनका अंतिम निर्धारण जांच से ही हो सकता है।
13 सितंबर ने खोल दी खेमेबंदी की तस्वीर
13 सितंबर को सिरौली में विधायक के समर्थन में हिंदू महापंचायत हुई, जिसमें आसपास के गांवों से लोग पहुंचे। दूसरी ओर रिस्तल में भाजपा नेता एवं पूर्व ब्लॉक प्रमुख अनिल कसाना के समर्थन में पंचायत हुई। इस तरह पहली बार विवाद के दोनों पक्षों की लामबंदी एक ही दिन अलग-अलग गांवों में खुलकर सामने आई।
सिरौली में विधायक समर्थकों ने हिंदुत्व, गौरक्षा और क्षेत्र के विकास को मुद्दा बनाया, जबकि रिस्तल में 5 सितंबर की घटना और कथित अभद्र व्यवहार पर नाराजगी जताई गई। मामला वरिष्ठ भाजपा नेतृत्व तक पहुंचाने की मांग भी उठी।
20 सितंबर को फिर दो तस्वीरें
20 सितंबर को गढ़ी कटैया में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. विनोद बंसल समेत दूसरे नेताओं की मौजूदगी में पंचायत हुई। यहां 20 से अधिक गांवों से लोगों के पहुंचने की जानकारी सामने आई और विधायक के कथित व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई गई। उसी दिन बाग राणप में विधायक समर्थकों ने पंचायत कर अपना पक्ष रखा।
इससे साफ है कि मामला अब केवल दो नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। पंचायतों का बढ़ता दायरा इसे लोनी की व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस में बदल रहा है।
लेकिन इस कहानी की जड़ें और पुरानी हैं
लोनी की मौजूदा सियासत को समझने के लिए 2008 के परिसीमन से पहले के खेकड़ा विधानसभा क्षेत्र तक लौटना होगा। वर्तमान लोनी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा तब खेकड़ा विधानसभा का हिस्सा था।
1993 में भाजपा के रूप चौधरी ने खेकड़ा से 51,760 वोट हासिल किए और मदन भैया से 15,625 वोट पीछे रहे। तीन साल बाद 1996 में तस्वीर पलट गई। रूप चौधरी ने 72,106 वोट लेकर मदन भैया को 24,960 वोट से हराया।
2008 के परिसीमन के बाद लोनी विधानसभा अस्तित्व में आई और 2012 में पहला चुनाव हुआ। इसके बाद 2017 और 2022 में नंदकिशोर गुर्जर ने लगातार जीत दर्ज की। 2022 में मदन भैया से उनका अंतर 8,676 वोट रहा।
यानी खेकड़ा के पुराने चुनावी संघर्ष से लेकर आज की लोनी तक राजनीति की जमीन कई बार बदली, चेहरे बदले और समीकरण बदले—लेकिन मुकाबले की राजनीति बनी रही।
अब सवाल पंचायतों से आगे का
5 सितंबर की घटना से शुरू हुआ विवाद 13 और 20 सितंबर की पंचायतों तक पहुंच चुका है। एक तरफ विधायक के समर्थन में सामाजिक लामबंदी है, दूसरी तरफ उनके कथित व्यवहार को लेकर विरोध। पुलिस अपनी कार्रवाई और जांच के स्तर पर है, जबकि राजनीतिक संगठन की भूमिका भी आगे महत्वपूर्ण हो सकती है।
लोनी में फिलहाल असली तस्वीर यही है—एक विवाद, कई पंचायतें और आमने-सामने खड़े दो राजनीतिक स्वर। अब देखना यह है कि यह पंचायतों तक सीमित रहता है या आने वाले दिनों में भाजपा की स्थानीय राजनीति के समीकरण भी बदलता है।
