नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग लड़की को गर्भपात की अनुमति देते हुए कहा है कि गर्भावस्था के कारण नाबालिग को गंभीर मानसिक रूप से गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि जो अभी खुद किशोरावस्था में है उससे बच्चे को जन्म देने और उसकी परवरिश की जिम्मेदारी उठाने की उम्मीद करना अनुचित होगा। अदालत ने नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसे एबॉर्शन की इजाजत दे दी। पीड़िता को 31 सप्ताह का गर्भ है।
अदालत ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दुष्कर्म की शिकार नाबालिग लड़की के गर्भपात के मामले को सिर्फ महिला के अधिकार तक सीमित करके देखा जाना उचित नहीं है, असल में यह पीड़िता के सम्मान के साथ जीने के अधिकार से भी जुड़ा हुआ मामला है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह आदेश दिया है कि गर्भपात का जो भी खर्च होगा वो सरकार वहन करेगी। साथ ही नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की पहचान को हर हाल में गोपनीय रखने का आदेश अदालत ने दिया है। अदालत ने कहा कि गर्भपात की प्रक्रिया के दौरान भ्रूण के टिश्यू को सुरक्षित रखा जाए, ताकि दुष्कर्म से जुड़े आपराधिक मामले में जरूरत पड़ने पर उसकी डीएनए जांच हो सके।
यह याचिका नाबालिग पीड़िता और उसकी मां की तरफ से दायर की गई थी। नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता चाहती थी कि कोर्ट उसे गर्भपात की अनुमति दे वहीं पीड़िता की मां ने अपनी बेटी की मानसिक हालत का हवाला देते हुए कोर्ट में कहा कि गर्भावस्था की वजह से उनकी बेटी की काफी परेशान है। वहीं कोर्ट को यह भी बताया गया कि गर्भपात के लिए पीड़िता को चिकित्सकीय रूप से फिट पाया गया है। इसके बाद अदालत ने गर्भपात कराने की अनुमति दे दी। यह मामला अन्य मामलों से इसलिए अलग है क्योंकि कानून 20 सप्ताह तक और कुछ निर्धारित श्रेणियों में 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति दिए जाने का प्रावधान है और इस पीड़िता को 31 सप्ताह का गर्भ है।
