भारत और श्रीलंका के बीच बनेगा पुल ! सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, व्यापारिक रूप से कितना होगा महत्वपूर्ण?
नई दिल्ली। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के बीच हैदराबाद हाउस में हुई मुलाकात ने दोनों पड़ोसी देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है। दोनों ही नेताओं ने आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए चर्चा की। दोनों ही नेताओं ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कहा कि हमारा मानना है कि भारत-श्रीलंका के सुरक्षा और विकास एक दूसरे से जुड़े रहें और इसलिए ये आवश्यक है कि हम एक दूसरे की सुरक्षा और संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए साथ मिलकर काम करें। इस कार्यक्रम का समापन भारत और श्रीलंका के बीच घनिष्ठ संबंधों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चार महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर के साथ किया गया।
भारत और श्रीलंका के बीच एक ब्रिज की योजना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ़ तौर पर ये कहा कि भारत और श्रीलंका के बीच एक ब्रिज यानि पुल बनाने को लेकर हम विचार कर रहे हैं। ये संभव है या नहीं और कि संभावनाएं इसमें छिपी हैं इसके लिए हम जांच करवा रहे हैं। ये पुल त्रिंकोमाली और कोलंबो बंदरगाहों को जोड़ने का काम करेगा। जिससे समुद्री यात्रा के समय और लागत में काफी कमी आएगी।
व्यापार और कनेक्टिविटी में क्रांति आने की उम्मीद
इस भूमि पुल से व्यापार और कनेक्टिविटी में क्रांति आने की उम्मीद है, जिससे दो प्रमुख बंदरगाहों के बीच माल और लोगों की निर्बाध आवाजाही हो सकेगी। आर्थिक लाभ के अलावा, भूमि पुल सांस्कृतिक संबंधों को भी बढ़ावा दे सकता है। अभी भारत और श्रीलंका के बीच करीबन 5 बिलियन डॉलर का ट्रेड होता है और कई विशेषज्ञ ये मानते हैं कि यदि इस तरह के पुल का निर्माण हो जाता है तो ये व्यापार 10 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि अभी श्रीलंका में कार्गो भेजने के लिए समुद्री रास्ते का उपयोग होता है जो काफी ज्यादा कॉस्टली होता है। लेकिन ये पुल बनते ही खर्चा 50% तक कम हो जाएगा। जाहिर तौर पर इससे दोनों देशों को बड़ा लाभ मिलेगा। और गौर करने वाली बात तो ये भी है कि श्रीलंका भारत से ही सबसे ज्यादा इम्पोर्ट करता है इसलिए ये भारतीय इकोनॉमी को भी बूस्ट देगा।
भूमि पुल का विचार बिल्कुल नया नहीं
लेकिन आपको बता दें कि भारत और श्रीलंका के बीच भूमि पुल का विचार बिल्कुल नया नहीं है। इस अवधारणा पर दशकों से चर्चा हो रही है, कुछ सालों पहले हमारे सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने दोनों देशों के बीच एक पुल बनाए जाने का आईडिया रखा था। लेकिन तब श्रीलंका के जो सड़क परिवहन मंत्री थे उन्होंने चीन के प्रभाव में आकर इसको सिरे से नकार दिया था। लेकिन आज जब भारत श्रीलंका के मुश्किल समय में काम आया है तो हालात अलग हैं। आज वो खुद इस समझौते के लिए तैयार हैं।
