दलितों और आदिवासियों के संगठनों ने आज रखा है भारत बंद, आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले का कर रहे विरोध
नई दिल्ली। दलितों और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के बीते दिनों आए फैसले के खिलाफ आज भारत बंद का एलान किया गया है। आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने भारत बंद की घोषणा की है। अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंधित तमाम संगठनों ने भारत बंद का समर्थन किया है। इस बंद का कांग्रेस, बीएसपी, आरजेडी, झारखंड मुक्ति मोर्चा और समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों ने भी समर्थन दिया है। मोदी सरकार में शामिल चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी ने भी बंद का समर्थन किया है। वहीं, मोदी सरकार में शामिल हम पार्टी के जीतनराम मांझी ने बंद के खिलाफ बयान दिया है। बंद का आह्वान करने वाले संगठनों की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण संबंधी ताजा फैसले के आलोक में सरकार इसे रद्द करने के लिए संसद से नया कानून पास कराए। भारत बंद के कारण राजस्थान के कुछ जिलों में प्रशासन ने स्कूल और कॉलेज बंद करने का आदेश दिया है। वहीं, सभी राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था को चौकस रखा गया है।
1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने अहम फैसले में कहा था कि अनुसूचित जाति और जनजाति में सब कैटेगरी बनाकर अलग से आरक्षण देने की इजाजत है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये फैसला 6-1 के बहुमत से सुनाया था। एक जज ने ये भी कहा कि ओबीसी पर जिस तरह क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू है, वैसा ही एससी और एसटी आरक्षण में भी लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने ये फैसला सुनाते हुए ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार मामले में 2004 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही खारिज कर दिया। इस फैसले में तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एससी और एसटी आरक्षण में सब कैटेगरी बनाने की इजाजत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अब कहा है कि अनुसूचित जातियों की सब कैटेगरी को राज्यों की ओर से परिमाणात्मक और प्रदर्शनीय आंकड़ों से उचित ठहराया जाना चाहिए। हालांकि, ये काम राज्य अपनी मर्जी से नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुझाव भी केंद्र सरकार को दिया था कि वो ओबीसी की तरह एससी और एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर की व्यवस्था शामिल करे। कोर्ट ने कहा था कि सच्ची समानता हासिल करने का यही अकेला तरीका है। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि पिछड़े समुदाय को प्राथमिकता देना राज्य का कर्तव्य है। वहीं, बेंच में शामिल जस्टिस बेला त्रिवेदी ने फैसले से असहमति जताई थी। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित की गई अनुसूचित जातियों की सूची में राज्य कोई बदलाव नहीं कर सकता। संसद के कानून से ही जातियों को सूची से बाहर या उसमें शामिल किया जा सकता है। उन्होंने सब कैटेगरी बनाने को सूची से छेड़छाड़ के बराबर बताया था।
