May 17, 2026

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पाकिस्तान-चीन की चाल हुई नाकाम!, तालिबान नहीं कर पाएगा UN महासभा को संबोधित

नई दिल्ली। अफगानिस्तान में कब्जा जमाने के बाद तालिबान ने अपनी सरकार बना ली है। सरकार की स्थापना के बाद तालिबान मान रहा था कि वो दूसरे देशों की तरह मान्यता प्राप्त कर लेगा। तालिबान के इस सपने को चीन और पाकिस्तान से सहारा मिल रहा था। तालिबान के आतंकी मान रहे थे कि वो चीन और पाकिस्तान की इशारे पर संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) सत्र में अपने प्रतिनिधित्व की मांग करेगा तो उसे सत्र को संबोधित करने का मौका दिया जाएगा लेकिन उसका ये सपना, सपना ही रह गया।

दरअसल, आगामी 27 सितंबर को अफगानिस्तान को महासभा में संबोधित करना है लेकिन तालिबान में गनी सरकार खत्म हो गई है और तालिबानी सरकार के आने के बाद से ही इसे लेकर असमंजस की स्थिति थी कि क्या अफगानिस्तान को महासभा में संबोधित करने की इजाजत मिलेगी या नहीं। लेकिन अब कहा जा रहा है तालिबान को संबोधन नहीं करने दिया जाएगा। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने एक सूत्र के हवाले से कहा, ‘अफगान सरकार के प्रतिनिधि तब तक संयुक्त राष्ट्र में मिशन पर कब्जा किए रहेंगे जब तक कि परिचय पत्र देने वाली कमिटी इस पर फैसला नहीं ले लेती है।’

15 सितंबर को वर्तमान अफगान दूत गुलाम इसाकजई ने संयुक्ति राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को एक पत्र दिया था जिसमें उन्होंने जोर देते हुए कहा था कि वो और उनकी टीम के अन्य सदस्यद महासभा की बैठक में अफगानिस्तान का प्रतिनिधि करेंगे। गुलाम इसाकजई के इस पत्र के कुछ दिनों बाद 20 सितंबर को तालिबान के नियंत्रण वाले अफगान विदेश मंत्रालय ने भी महासचिव को एक पत्र लिखा जिसमें उसने बैठक में हिस्सा लेने के लिए इजाजत मांगी। दोनों के पत्र के बाद कमिटी फैसला करेगी कि किसे संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व देना है।

यहां बता दें कि आने वाले 27 सितंबर को ही अफगानिस्तान को महासभा को संबोधित करना है ऐसे में इसे लेकर उम्मीद न के बराबर है कि उसे (तालिबान) को कमेटी मान्यता दे। दूसरी ओर कमेटी मान्यता दे भी दे तो इस विवाद का निपटारा 2 से 3 दिनों में होना असंभव है।

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र के नए स्थायी प्रतिनिधि के रूप में तालिबान की ओर से मोहम्मद सुहैल शाहीन को चुना गया है। सुहैल शाहीन तालिबान के प्रवक्ता हैं जो कतर शांति वार्ता में तालिबान का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के सामने अब बड़ा सवाल ये है कि क्या तालिबान को अपनी बात रखने के लिए वैश्विक स्तर पर एक मंच दिया जाए?। अगर हां तो किस हद तक अभिव्यक्ति की आजादी?

 

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