‘कोर्ट में दबंगई करते हैं…कुछ जजों में दिव्यता का झूठा अहसास’, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किताब में और क्या लिखा जानिए
नई दिल्ली। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की किताब ‘The Bench, the Bar and the Bizarre’ की चर्चा हो रही है। दरअसल, अपनी किताब में तुषार मेहता ने कई जजों पर सवाल खड़े किए हैं। तुषार मेहता का कहना है कुछ जजों में दिव्यता का झूठा अहसास पैदा हो गया है। उन्होंने अपनी किताब में ये भी लिखा है कि कुछ जज दबंगई करते हैं। अपनी किताब दे बेंच, द बार एंड द बिजार में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विदेश के कोर्ट्स की घटनाओं का जिक्र करते हुए लिखा है कि किस तरह दादागीरी की जाती है।
द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के मुताबिक तुषार मेहता ने अपनी किताब में लिखा है कि कुछ जज वकीलों की बात लगातार काटते हैं। कुछ सख्ती की हद पार कर अपमान करने पर भी उतारू हो जाते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने किताब में लिखा है कि न्यायिक व्यवस्था मुकदमेबाजी के लिए ही है। फिर भी हम अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की सुरक्षा की सीधे तौर पर मांग नहीं कर सकते। तुषार मेहता के मुताबिक लोगों को वकील के जरिए ही माननीय जजों से सादर अनुमति लेकर अपनी बात रखनी पड़ती है। उन्होंने लिखा है कि अगर बेंच स्पष्ट रूप से बेतुकी कानूनी बात भी करता है, तो वकील सबसे पहले हम माननीय जज के सामने नतमस्तक हैं कहकर ही जवाब देते हैं। फिर साहस जुटाकर वकील माननीय जज के सामने कोई वैकल्पिक प्रस्ताव रखने की गुस्ताखी की हिम्मत करते हैं।
अखबार के मुताबिक तुषार मेहता ने अपनी किताब में दुनियाभर के अलग-अलग कोर्ट के कई दिलचस्प और गहरे उदाहरण दिए हैं। मेहता ने ये भी लिखा है कि जजों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने किताब में लिखा है कि कोर्ट बहुत ज्यादा भीड़भाड़ और तंग जगह होते हैं। वहां काम करने का माहौल सुखद तो नहीं ही होता। सॉलिसिटर जनरल ने लिखा है कि जज भी काम के बोझ तले दबे हैं। तुषार मेहता ने किताब में ये भी लिखा है कि अदालतों में बहुत कम इनफ्रास्ट्रक्चर और नाममात्र का संस्थागत सहयोग होता है। उन्होंने ये भी लिखा है कि जो संसाधन होते हैं, वे अक्सर केसों की संख्या और जटिलता के हिसाब से असंतुलित होते हैं। अब देखना है कि तुषार मेहता की इस किताब पर जजों की क्या प्रतिक्रिया रहती है?
