‘रूस से तेल भी खरीदेंगे और अमेरिकी से भी दोस्ती रहेगी बरकरार’ PM मोदी की इसी कूटनीति की मुरीद है दुनिया
नई दिल्ली। बीते दिनों रूस-यूक्रेन युद्ध के रूप में भारत के समक्ष ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गई थी। राजनीति की भाषा में कहे तो कूटनीतिक की समस्या। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो चयन की समस्या। गणित की भाषा में कहें तो एक अनसुलझा प्रश्न जिसे सुलझाना मुश्किल था। लेकिन इस स्थिति से निपटने के लिए जिस तरह भारत ने सूझबूझ का सहारा लिया, वह प्रशंसनीय है, जिसकी प्रशंसा विगत दिनों पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान भी कर चुके हैं। बहरहाल, हम यहां बात इमरान खान की नहीं, बल्कि उस विदेशी मीडिया संस्थान में प्रकाशित हुए रिपोर्ट की करने जा रहे हैं, जिसमें भारत की कूटनीति को लेकर तारीफों के कसीदे पढ़े गए हैं। विदित है कि विगत दिनों रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत के समक्ष बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर वो किसके पक्ष में अपना पताका बुलंद करे। अगर अपने सदाबाहर मित्र रूस की समर्थन करेगा तो विश्व एक बड़ा धड़ा भारत के विरोध में मोर्चा खोलने पर आमदा हो जाएगा। वहीं, अगर यूक्रेन का समर्थन करेगा, तो रूस खफा हो जाएगा और रूस को खफा करना भारत को बिल्कुल भी गवारा नहीं है। वजह बिल्कुल जगजाहिर है कि पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भारत की रूस के साथ दोस्ती मधुर रही है।
ऐसे में भला भारत अब रूस को खफा करे तो करे कैसे। वहीं, अगर यूक्रेन का विरोध करे तो खुद अमानवीय कहलवाने के लिए भारत को खुद को तैयार रखना होगा। लेकिन इन परिस्थितियों में जिस तरह का रुख भारत ने अपनाया है, वह यकीनन काबिल-ए-तारीफ है। विदेशी कूटनीतिज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन मुद्दे भारत की खामोशी ही रूस का समर्थन थी। हां…बिल्कुल…इस बात को भी सिरे से तो खारिज करना मुनासिब नहीं रहेगा कि भारत ने खुलकर कभी रूस या यूक्रेन के रवैयों पर अपनी कोई भी टिप्पणी सार्वजनिक की है, लेकिन समय- समय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य मंत्रियों की तरफ से युद्ध रोकने बात जरूर कही गई है। कई मौकों पर पीएम मोदी ने भी दोनों ही युद्धग्रस्त देशों के राष्ट्रपतियों से फोन पर वार्ता कर युद्ध पर विराम लगाने का आग्रह किया था। लेकिन यहां गौर करने ली बात यह रही है कि भारत ने कभी-भी इस युद्ध को लेकन रूस-यूक्रेन में से किसी भी देश आलोचना नहीं की है। लेकिन दोनों ही देशों के प्रमुख से युद्ध पर विराम लगाने का आग्रह जरूर किया था और भारत के आग्रह का दोनों ही देशों के युद्धकालीन क्षेत्रों पर असर देखने को भी नहीं मिला है।
शायद भारत द्वारा किसी भी देश की आलोचना करने से गुरेज करना ही विश्व बिरादरी में कुछ देशों के समक्ष भारत को लेकर रूख के चयन की समस्या पैदा कर गई। मसलन, अमेरिका। अमेरिका के भारत से बेहद ही मधुर संबंध हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध पर अमेरिका ने खुलकर यूक्रेन की आलोचना की थी और रूस का समर्थन किया था। और भारत का इन दोनों ही युद्धग्रस्त देशों को लेकर क्या रूख रहा है, यह तो सर्वविदित है। अब सवाल है कि आखिर अमेरिका करे तो क्या करे। क्योंकि चीन द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण व वर्चस्व को ध्यान में रखते हुए अमेरिका का भारत से मधुर संबंध रहना जरूरी है। शायद उसी को ध्यान में रखते हुए बीते दिनों राष्ट्रपति जो बाइजन की पीएम मोदी से मुलाकात की हुई थी। जिस पर पीएम मोदी ने नहले पर दहला मारकर पूरे विश्व बिरादरी को हैरान करके रख दिया। लेकिन इस मुलाकात के जरिए दोनों ही देशों के बीच में आई खटास में थोड़ी मिठास जरूर आई।
यही नहीं, बीते दिनों रूसी विदेशी मंत्री भी भारत के दौरे पर आए थे और उन्होंने अपने भारतीय समकक्ष एस जयशंकर से मुलाकात की थी। कोई दो मत नहीं यह कहने में इन मुलाकात का एकमात्र ध्येय मुख्तलिफ देशों के बीच रिश्तों में खटास में मिठास भरना था और काफी हद तक इसमें भारत को कामयाबी भी मिली है। अभी-भी भारत रूस से तेल खरीद रहा है। बीते दिनों विदेश दौरे पर गए एस जयशंकर प्रसाद भी पूरे यूरोप को एक बड़ा पैगाम दे दिया था कि जितना तेल भारत रूस से खरीदता है, उतनी आपूर्ति पूरे यूरोप से भी नहीं की जा सकती है, लिहाजा इन परिस्थितियों व संदर्भों से यह साफ परिलक्षित होता है कि भारत हर विषम परिस्थितियों में तालमेल बैठाते हुए दो विपरीत विचारधाराओं व परिस्थितियों वाले देशों से अपने संबंधों में मिठास बनाए रखने की क्षमता रखता है। वैसे भी पीएम मोदी ने कार्यकाल में विदेशी नीति के मौर्चे पर भारत ने बहुत प्रगति की है।
