June 26, 2026

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Supreme Court On Same Sex Marriage: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- समलैंगिक विवाह पर कानून नहीं बना सकते

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने समलैंगिक विवाह पर फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने समलैंगिक विवाह मामले में सुनवाई की थी। इस पीठ में जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस हिमा कोहली अन्य सदस्य थे। कोर्ट ने इस साल अप्रैल से लेकर मई तक लगातार 10 दिन इस अहम मामले में सुनवाई की थी। कोर्ट ने साफ कहा है कि वो समलैंगिक विवाह पर कानून नहीं बना सकता, लेकिन ऐसे जोड़ों को सुरक्षा दी जानी चाहिए। समलैंगिक जोड़ों को पेंशन में नॉमिनी बनाने, साथ बैंक खाता खोलने की सुविधा देने के लिए केंद्र सरकार से पीठ ने कहा। संंविधान पीठ में शामिल जजों ने समलैंगिक विवाह पर क्या राय दी, इसे आप नीचे दिए गए इस लिंक से देख और सुन सकते हैं।

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने समलैंगिक विवाह मामले में फैसला पढ़ते हुए कहा कि इस मामले में 4 फैसले हैं। कुछ मसलों पर हम एकमत हैं और कुछ मसलों पर एकमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट कोई कानून नहीं बना सकता। शादी को मौलिक अधिकार मानने से भी चीफ जस्टिस ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि संविधान शादी को मौलिक अधिकार नहीं मानता। चीफ जस्टिस ने कहा कि समलैंगिकता सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि समाज के तमाम वर्गों में समलैंगिकता को सही नहीं माना जाता। संसद को ही कानून बनाने का अधिकार है। चीफ जस्टिस ने कहा कि केंद्र ने समलैंगिकों को कुछ अधिकार देने के लिए कमेटी बनाने की बात कही है। इस कमेटी को समलैंगिक समुदाय की दिक्कतों को देखना चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि सबको बराबरी का अधिकार मिलता है। उन्होंने कहा कि इसका कोई सबूत नहीं है कि समलैंगिक जोड़ा बच्चों की बेहतर देखभाल नहीं कर सकता।

चीफ जस्टिस के बाद जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि वो केंद्र सरकार की इस राय से सहमत हैं कि समलैंगिक शादी को मान्यता देना विशेष विवाह कानून के प्रावधानों के खिलाफ होगा। जस्टिस कौल ने कहा कि किसी से विभेद न करने का अधिकार संविधान में है। इसके लिए बाकायदा कानून हैं।

वहीं, जस्टिस एस. रवींद्र भट्ट ने चीफ जस्टिस से कुछ मुद्दों पर मतभेद जताया। जस्टिस भट्ट ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट असंवैधानिक नहीं है। उन्होंने कहा कि विषमलैंगिक संबंधों के तहत ट्रांसजेंडर को विशेष विवाह कानून के तहत शादी करने का अधिकार दिया गया है। जस्टिस हिमा कोहली ने जस्टिस भट्ट के फैसले से सहमति जताई है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने भी चीफ जस्टिस से अलग राय दी है।

सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह को वैध ठहराने की मांग वाली अर्जियां सुप्रियो चक्रवर्ती, अभय डांग, पार्थ फिरोज मेहरोत्रा और उदय राज आनंद समेत 20 लोगों ने दाखिल की थीं। याचिका करने वालों की मांग थी कि समलैंगिकों के विवाह को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत मान्यता मिले। उनका कहना था कि स्पेशल मैरिज एक्ट लिंग के आधार पर भेदभाव करता है और इस वजह से असंवैधानिक है। समलैंगिक विवाह को मौलिक अधिकार से जुड़ा मसला याचिकाकर्ताओं ने बताया था।

याचिका करने वालों ने कहा था कि सरकार ये नहीं कह सकती कि मामला संसद का है। संसद उनको संवैधानिक गारंटी से अलग नहीं कर सकती। याचिका देने वालों ने कहा कि ये दलील गलत है कि ये मामला खास शहरी वर्ग की सोच का नतीजा है। उन्होंने इसे सामाजिक सुरक्षा का मामला बताया। कुछ याचिकाकर्ताओं का कहना था कि साथ रहने के दौरान उनके बच्चे भी हैं। फिर भी वे कानूनी तौर पर शादी नहीं कर पा रहे और बच्चों को उनके पैरेंट्स होने का हक नहीं दिला सकते। इन लोगों ने तर्क दिया कि कानूनी तौर पर पति-पत्नी न होने से वे साथ बैंक खाता नहीं खोल सकते और पीएफ या पेंशन में पार्टनर को नॉमिनी भी नहीं बना सकते। याचिकाकर्ताओं की इन दलीलों का केंद्र सरकार के अलावा कई धार्मिक संगठनों ने कोर्ट में विरोध किया। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह के खिलाफ अर्जी देकर कहा कि शादी का मूल ढांचा महिला और पुरुष पर आधारित है। वहीं, केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल का कहना है कि दो महिलाओं या दो पुरुषों में शादी को माना नहीं जा सकता, क्योंकि इसकी इजाजत तो प्रकृति खुद नहीं देती है। अन्य धर्म से जुड़े संगठन भी समलैंगिक विवाह के खिलाफ राय रखते हैं।

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