April 24, 2026

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गुर्जर, गौत्र और शादी पर विचार वक्त की दरकार

जमवारामगढ़!(रतनलालगुर्जर) गुर्जर समाज एक बहुत की सामाजिक समरसता और अतिथि सत्कार के लिए जाने जाना वाला समाज हैं। पौराणिक काल से ही गुर्जर समाज इस देश और संस्कृति की धुरी रहा हैं। गुर्जर समाज मूलत: एक कबिलाई समाज हैं जिसमे अलग अलग गौत्र के कबिले और उन कबीलों का सुचारू रूप से संचालन करने के लिए कबीले के सबसे योग्य व्यक्ति को सरदार बनाकर उसका संचालन किया जाता था।

वक्त की जरूरत के साथ कबिलाई जीवन की सभ्यता में बदलाव आता गया और आज भी गुर्जर समाज देश के सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर समाजों में से एक हैं। हम ताकतवर बने रहे, अपनी ताकत को कम नही होने दिया उसकी सबसे बड़ी वजह है कि हमने अपने आपको वक्त की जरूरत के हिसाब से बदला है। जो समाज अपने आपको वक्त के साथ बनी परंपराओं में बदलाव नहीं करता वो समाज कमजोर हो जाता हैं और मुख्यधारा से पिछड़ जाता हैं। जैसे एक वक्त पर दुनिया में डायनासोर हुआ करते थे जो बहुत ही ताकतवर थे लेकिन उन्होंने अपने आपको समय की जरूरत के हिसाब से नहीं बदला और वो इस दुनिया से खत्म हो गए ।

प्रकृति और समय का नियम है जो इनकी गति के हिसाब से अपने आपको नहीं बदलता है उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता हैं ।

हमारे समाज ने भी समय की गतिशीलता को देखते हुए अपने आप में बहुत बदलाव किये हैं। एक समय हमारे समाज में शादी ब्याह के लिए चार गौत्र दादी, नानी, माता, पिता को छोड़कर शादी ब्याह किए जाते थे। फिर जब शादी ब्याह में ये गौत्र परेशानी पैदा करने लगे तो नानी के गौत्र को बाहर कर दिया गया और तीन गौत्र दादी, माता और पिता को छोड़कर शादी ब्याह करने लगे ।

ऐसा ही हमारे समकक्ष सामाजिक ताना- बाना रखने वाले अहीर और जाट समाज ने भी किया । फिर अब हालत फिर से गंभीर हुए तो देश के विभिन्न हिस्सों में समाज की खाप(गौत्र) पंचायतों ने निर्णय लिया की अब जरूरत दादी के गौत्र को छोड़ने की भी नहीं होनी चाहिए।

दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, यूपी, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि जगह गुर्जर समाज ने शादी ब्याह के लिए सिर्फ माता – पिता के गौत्र को ही छोड़ना जरूरी समझा और इन प्रदेशों में रहने वाले गुर्जर समाज के शादी ब्याह के लिए ये ही दो गौत्र (माता और पिता) के अलावा कोई भी गौत्र टालना शादी के लिए जरूरी नहीं है और आज रिश्ता देखते समय सिर्फ इन्हीं दो गौत्र को माना जाता हैं।

राजस्थान में भी इसको लेकर बदलाव की जरूरत है। जैसे उत्तरी-पूर्वी राजस्थान में कसाना, रावत, चंदेला सख्या के हिसाब से बड़े गौत्र है और इन 3 गौत्र के होते हुए अच्छे और मेल के रिश्ते होना बहुत मुश्किल है। इसी तरह पूर्वी राजस्थान में खटाना, बैंसला, कसाना गौत्र है।

समाज ने वक्त के साथ अपने आपको बदला है और आगे भी बदलना चाहिए। नियम, परंपराएं समय की जरूरत के हिसाब से बदलती रहती हैं और आज जरूरत गौत्र को लेकर बदलाव की भी है। जाट समाज ने सोनीपत हरियाणा में 20 फरवरी 2013 को सर्वखाप पंचायत बुलाकर सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को पारित किया था कि अब नानी के बाद दादी का गौत्र भी छोड़ना जरूरी नहीं है।

ऐसा ही गुरुग्राम में अहीर समाज ने पंचायत बुलाकर किया । राजस्थान के गुर्जर समाज को भी अब इस बदलाव को लेकर सोचना होगा और लागू भी करना होगा, क्योंकि देश के अन्य हिस्सों का गुर्जर समाज इसको अपना चुका है । समाज में आए दिन होने वाले बे-मेल विवाह के लिए ये भी कहीं न कहीं बड़ी वजह है, जिससे पारिवारिक जीवन पर बहुत बड़ा नकारात्मक असर देखने को मिलता है। इसलिए समाज को अब 3 गौत्र से 2 गौत्र की तरफ देखना होगा जिससे समय की गतिशीलता को पहचानकर समाज अपने आपको स्थापित रख सके ।

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