न्याय की देवी की आंखों पर अब नहीं होगी पट्टी, प्रतिमा में किया गया बदलाव
नई दिल्ली। अदालतों में लगी न्याय की देवी की प्रतिमा की आंखों पर अब पट्टी नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने बरसों पुरानी अंग्रेजों की शुरू की गई इस परम्परा में बदलाव किया है। सीजेआई के आदेश के मुताबिक अब से न्याय की देवी की किसी भी प्रतिमा की आंखों पर पट्टी नहीं बांधी जाएगी। इतना ही नहीं प्रतिमा के बाएं हाथ में तलवार की जगह अब संविधान की किताब ने ले ली है। जबकि दाएं हाथ में पहले की ही तरह तराजू है। इस तरह की न्याय की देवी की नई प्रतिमा सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में जजों के लिए बनी लाइब्रेरी में स्थापित की गई है।
दरअसल 17वीं शताब्दी में एक अंग्रेज अफसर द्वारा इस मूर्ति को भारत लाया गया था। वो अंग्रेज अफसर न्यायिक विभाग में कार्यरत था। ब्रिटिश काल में 18वीं शताब्दी के दौरान न्याय की देवी की मूर्ति को सार्वजनिक रूप से स्थापित किया गया। इसके बाद जब भारत आजाद हुआ तब भी न्याय की देवी की इस प्रतिमा में कोई बदलाव नहीं किया गया। तब से लेकर अब तक आंखों पर पट्टी, एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में तराजू लिए न्याय की देवी की प्रतिमा देश की हर अदालत में स्थापित है। हालांकि आंखों में पट्टी होने का मतलब निष्पक्षता से है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि न्याय की देवी बिना किसी को देखे निष्पक्ष रूप से न्याय करती हैं।
वहीं इसको लेकर बॉलीवुड फिल्म का एक डायलाग ‘कानून अंधा होता है’ बहुत प्रचलित है। वहीं अंधा कानून नाम से एक सुपरहिट फिल्म भी बन चुकी है। इसके अलावा ‘ये अंधा कानून है, अंधा कानून है’ गाना भी अक्सर सुनने को मिल जाता है। मगर अब फिल्म निर्माताओं को भविष्य में ये संदेश देना होगा कि कानून अंधा नहीं है। कानून सबकुछ देखते हुए न्याय करता है।
