‘महाकुंभ में चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि हृदय की सुंदरता का महत्व होना चाहिए’, साध्वी हर्षा रिछारिया के वायरल होने पर भड़के शंकराचार्य
नई दिल्ली। प्रयागराज में महाकुंभ के पहले अमृत स्नान के दौरान मॉडल और एंकर हर्षा रिछारिया के शाही रथ पर बैठने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इसे परंपरा के खिलाफ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई है।
शंकराचार्य ने कहा कि महाकुंभ जैसे धार्मिक आयोजन में इस तरह की प्रथाओं को बढ़ावा देना सनातन संस्कृति के लिए हानिकारक है। उन्होंने कहा, “महाकुंभ में चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि हृदय की सुंदरता का महत्व होना चाहिए। जो व्यक्ति अभी यह तय नहीं कर पाया है कि उसे संन्यास लेना है या शादी करनी है, उसे संतों और महात्माओं के शाही रथ पर बैठाने का कोई औचित्य नहीं है।”
सनातन परंपरा का सवाल
शंकराचार्य ने कहा कि भगवा वस्त्र केवल संन्यासियों को ही धारण करने की अनुमति है। उन्होंने इसे पुलिस की वर्दी से तुलना करते हुए कहा कि जैसे पुलिस की वर्दी केवल पुलिस कर्मियों को ही मिलती है, उसी प्रकार भगवा वस्त्र केवल सन्यासियों के लिए हैं। उन्होंने हर्षा के शाही रथ पर बैठने को पूरी तरह अनुचित और सनातन परंपरा के खिलाफ बताया।
हर्षा रिछारिया का बयान
अमृत स्नान के बाद एंकर हर्षा रिछारिया ने कहा कि उन्हें दिव्य अनुभूति हो रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने लगभग पौने दो साल पहले अपने गुरु से दीक्षा ली थी, लेकिन अभी तक संन्यास धारण करने का अंतिम निर्णय नहीं लिया है। हर्षा ने खुद को साध्वी कहे जाने पर भी आपत्ति जताई। इस विवाद ने महाकुंभ की पवित्रता और पारंपरिक मान्यताओं पर नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या धार्मिक आयोजनों में इस प्रकार की नई परंपराओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
