‘शरीयत के खिलाफ है उत्तराखंड का यूसीसी…हम कोर्ट जाएंगे’, जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का एलान
नई दिल्ली। उत्तराखंड में सोमवार से समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लागू किया गया है। इसके खिलाफ इस्लामी संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद खड़ा हो गया है। जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने उत्तराखंड में लागू यूसीसी को शरीयत और लोगों की धार्मिक आजादी पर हमला बताया है। उनका ये भी कहना है कि यूसीसी भेदभाव और पूर्वाग्रह वाला है। उत्तराखंड के यूसीसी को जमीयत अध्यक्ष ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का एलान भी किया है। जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि शरीयत के खिलाफ कोई भी कानून मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि मुसलमान हर चीज पर समझौता कर सकता है, लेकिन शरीयत पर नहीं।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष ने कहा कि उत्तराखंड के यूसीसी में संविधान के 366वें अनुच्छेद के तहत अनुसूचित जनजातियों को दायरे में नहीं लाया गया है। तर्क दिया गया है कि अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकारों को सुरक्षा दी गई है। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अगर संविधान के अनुच्छेद के तहत अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखा जा सकता है, तो फिर मुसलमानों को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक आजादी क्यों नहीं दी जाती। इन अनुच्छेद में धार्मिक आजादी की गारंटी है। इस तरह उत्तराखंड का यूसीसी मौलिक अधिकारों को नकार देता है। जमीयत के अध्यक्ष ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने धार्मिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं कर सकता। उन्होंने यूसीसी को एकता और अखंडता के लिए नुकसान वाला भी कहा।
दरअसल, उत्तराखंड के यूसीसी के तहत सभी समुदायों के लिए शादी, तलाक, गोद लेने, विरासत जैसे मामले एक ही कानून के दायरे में लाए गए हैं। जबकि, मुस्लिमों में इन सभी मामलों में पर्सनल लॉ के तहत काम होता है। मसलन मुस्लिमों में बेटियों को विरासत नहीं दी जाती। वहीं, शादी काजी कराता है और इसका कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता। तलाक भी मौखिक होता है और मेहर की रकम के अलावा गुजारा भत्ता देने जैसी कोई बात शरीयत में नहीं है।
