सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को सुप्रीम कोर्ट से भी झटका
दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर वीके सक्सेना की मानहानि में दोषी, जुर्माना न भरने की ही मिली राहत
नई दिल्ली। मानहानि के मामले में नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की दोषसिद्धि और सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सोमवार को कहा कि वो दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगी। मेधा पाटकर के खिलाफ दिल्ली के मौजूदा लेफ्टिनेंट गवर्नर वीके सक्सेना ने 25 साल पहले मानहानि का केस किया था। सुप्रीम कोर्ट ने मेधा पाटकर को सिर्फ इतनी राहत दी कि उनको जुर्माना नहीं देना होगा।
इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने मेधा पाटकर को अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर रिहा किया था। साथ ही तीन साल में एक बार ट्रायल कोर्ट में पेश होने के लिए कहा था। सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के खिलाफ मानहानि का केस करते वक्त वीके सक्सेना गुजरात में एक एनजीओ के प्रमुख थे। मेधा पाटकर को ट्रायल कोर्ट ने 1 जुलाई 2024 को 5 महीने के साधारण कैद और 10 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट ने माना था कि नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता के बयान न सिर्फ मानहानि करने वाले, बल्कि वीके सक्सेना के खिलाफ नकारात्मक धारणाओं को भड़काने वाले भी थे।
मेधा पाटकर ने वीके सक्सेना पर आरोप लगाया था कि वो गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हित के लिए गिरवी रख रहे हैं। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि ये आरोप शिकायतकर्ता की ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर हमला है। ट्रायल कोर्ट के आदेश को मेधा पाटकर ने सेशन कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन वहां से भी उनको दोषी ठहराया गया था। सेशन कोर्ट ने मेधा पाटकर को 25 हजार का बॉण्ड भरने और 1 लाख जुर्माना देने को कहा था। मेधा पाटकर ने इसे दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जहां हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही मेधा पाटकर को अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर रिहा किया था। अब सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को जुर्माना तो नहीं भरना होगा, लेकिन मानहानि मामले में वो देश की सबसे बड़ी अदालत से भी दोषी साबित हो गई हैं।
