April 18, 2026

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‘राष्ट्रपति और गवर्नर को समयसीमा में नहीं बांध सकती संवैधानिक अदालत’, द्रौपदी मुर्मु के 14 सवालों वाले रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट ने दी ये राय

नई दिल्ली। संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुप्रीम कोर्ट को 14 सवालों का रेफरेंस भेजकर राय मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने गुरुवार को इस पर अपनी राय दी। सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि बेंच का मानना है कि राज्यों की विधानसभाओं से पास बिलों को मंजूरी देने या न देने का फैसला लेने के लिए कोर्ट राष्ट्रपति या गवर्नर के लिए समयसीमा तय नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि गवर्नर की तरफ से फैसला लेने में देरी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट किसी बिल को अपनी तरफ से मंजूरी नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने राष्ट्रपति के रेफरेंस पर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत किसी बिल पर फैसला लेने के लिए कोर्ट समयसीमा तय नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति और गवर्नर को बिल पर फैसला लेने के लिए समयसीमा में बांधना संविधान की भावना के खिलाफ होगा। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 में कहा गया है कि गवर्नर किसी बिल को मंजूरी दे सकते हैं, उसे फिर विधानसभा को भेज सकते हैं और राष्ट्रपति को भी भेज सकते हैं। अगर विधानसभा किसी बिल को दोबारा वैसा ही पास कर दे, तो गवर्नर को उसे मंजूरी देनी होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि काम का निर्वहन न्यायसंगत नहीं है। कोई कोर्ट मेरिट पर नहीं जा सकता, लेकिन लंबे वक्त तक बिना किसी वजह के देरी होने पर सीमित विवेक दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के रेफरेंस पर राय दी है कि न्यायिक रिव्यू पर पूरी तरह रोक है, लेकिन लंबे वक्त तक कार्रवाई न करने की हालत में संवैधानिक कोर्ट अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि जब भी राष्ट्रपति के लिए कोई गवर्नर बिल को रिजर्व करते हैं, तो राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सलाह नहीं लेनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बिल की स्थिति पर राष्ट्रपति और गवर्नर का फैसला न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने ये भी राय दी कि राष्ट्रपति और गवर्नर की शक्ति को संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर नहीं बदला जा सकता। मंजूरी मान लेने (डीम्ड) का सवाल नहीं उठता। कोई कोर्ट गवर्नर की मंजूरी की जगह नहीं ले सकता।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या कोई संवैधानिक कोर्ट विधानसभाओं से पास बिलों को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति और गवर्नरों के लिए समयसीमा तय कर सकती है? राष्ट्रपति के इस रेफरेंस पर सीजेआई बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की संविधान पीठ ने 10 दिन तक सुनवाई के बाद 11 सितंबर 2025 को अपनी राय सुरक्षित कर ली थी। राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से इस लिए राय मांगी थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु विधानसभा से पास विधेयकों पर 8 अप्रैल 2025 को फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था कि राष्ट्रपति और गवर्नरों को तीन महीने में पास हुए बिल पर फैसला लेना होगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो बिलों पर उनकी मंजूरी मान ली जाएगी। सुप्रीम कोर्ट की बेंच के इस फैसले पर राष्ट्रपति ने आपत्ति जताई और कोर्ट से पूछा कि जब संविधान किसी बिल पर फैसला लेने का विवेकाधिकार देता है, तो सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल कैसे दे सकता है।

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