क्या है तलाक-ए-हसन? सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए इस प्रथा पर उठाया सवाल, रद्द करने के दिए संकेत
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘तलाक-ए-हसन’ की प्रथा को लेकर नाराजगी व्यक्त करते हुए चिंता जताई। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सवाल किया कि आधुनिक सभ्य समाज में महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली इस प्रथा को क्या चलते रहने दिया जाना चाहिए? कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक के बाद अब तलाक-ए-हसन को रद्द करने पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना पर पक्षकारों से सुझाव मांगा है।
तलाक-ए-हसन इस्लामी कानून में तलाक का एक रूप है, जिसमें पति तीन महीने की अवधि में हर महीने में एक बार पत्नी को तलाक कहता है। अदालत ने पतियों के वकीलों द्वारा पत्नियों को तलाक का नोटिस भेजने की प्रथा पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इससे पति बाद में तलाक देने से इनकार कर देते हैं और जब पत्नियां दोबारा शादी करती हैं तो उन पर बहुपतित्व का आरोप लगा देते हैं। लाइव लॉ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि एक बार जब आप हमें संक्षिप्त नोट देंगे तो हम मामले को पांच न्यायाधीशों की बेंच को सौंपने की वांछनीयता पर विचार करेंगे।
यह जनहित याचिका पत्रकार बेनजीर हीना की ओर से दाखिल की गई है जिसमें उनकी ओर से तलाक-ए-हसन को अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन बताते हुए पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसके पति ने कथित तौर पर एक वकील के माध्यम से तलाक-ए-हसन का नोटिस भेजकर उसे तलाक दे दिया था। महिला ने कहा कि उसका पति दूसरी शादी कर चुका है जबकि विधिवत तलाक न होने के कारण पेपर नहीं बन पा रहे हैं और इसके चलते उसे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
