मर जाना स्वीकार लेकिन…वंदे मातरम पर संसद में चर्चा के बीच अरशद मदनी का बयान
नई दिल्ली। वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में जहां एक और संसद में इस पर चर्चा हो रही है। वहीं दूसरी ओर जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम को लेकर बड़ा बयान दिया है। मदनी ने कहा, हम एक खुदा (अल्लाह) को मानने वाले हैं, अल्लाह के सिवा न किसी को पूजनीय मानते हैं और न किसी के आगे सजदा करते हैं। हमें मर जाना स्वीकार है, लेकिन शिर्क (खुदा के साथ किसी को शामिल करना) कभी स्वीकार नहीं है।
मदनी ने सोशल मीडिया पर लंबी चौड़ी पोस्ट में लिखा, हमें किसी के वंदे मातरम पढ़ने या गाने पर आपत्ति नहीं है, लेकिन मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इबादत में अल्लाह के सिवा किसी दूसरे को शामिल नहीं कर सकता। वंदे मातरम का अनुवाद शिर्क से संबंधित मान्यताओं पर आधारित है, इसके चार श्लोकों में देश को देवता मानकर ‘दुर्गा माता’ से तुलना की गई है और पूजा के शब्दों का प्रयोग हुआ है। साथ ही ‘मां, मैं तेरी पूजा करता हूं’ यही वंदे मातरम का अर्थ है। यह किसी भी मुसलमान की धार्मिक आस्था के खिलाफ है इसलिए किसी को उसकी आस्था के खिलाफ कोई नारा या गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) देता है।
मदनी ने कहा, वतन से मोहब्बत करना अलग बात है, उसकी पूजा करना अलग बात है। मुसलमानों को देशभक्ति के लिए किसी के प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी कुर्बानियां इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हैं। इससे पहले मदनी ने वंदे मातरम पर कहा था कि मुर्दा कौमें सरेंडर कर दिया करती हैं। वो कहेंगे वंदे मातरम बोलो, तो लोग पढ़ना शुरू कर देंगे। इसके साथ ही मदनी ने देश की सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि जुल्म होगा, तो जिहाद होगा।
