March 3, 2026

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खामेनेई मामले में मोदी सरकार के स्टैंड पर सवाल उठा रहा विपक्ष, जबकि लीबिया के गद्दाफी की हत्या पर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार भी रही थी चुप

नई दिल्ली। कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेता ये सवाल उठा रहे हैं कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर मोदी सरकार चुप क्यों है? कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो अखबारों में लेख लिखकर खामेनेई की मौत पर मोदी सरकार की चुप्पी को कर्तव्यहीनता बताया है। ऐसे में सवाल ये है कि पहले क्या हर ऐसी मौत पर भारत विरोध जताता या शोक प्रकट करता रहा है? ज्यादा पुरानी बात नहीं है। साल 2011 में जब एक अफ्रीकी देश में जनता ने विद्रोह कर शासक को सत्ता से उतार फेंका और बाद में उसकी हत्या हुई, उस वक्त कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भी चुप्पी साध ली थी।

बात लीबिया की हो रही है। वहां मुअम्मर गद्दाफी का शासन था। मुअम्मर गद्दाफी लीबिया की सत्ता पर 42 साल से काबिज थे। भारत के बनाए गुट निरपेक्ष देशों के गुट में लीबिया भी था। जब भारत में साल 1983 में इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन हुआ था, उस वक्त भी मुअम्मर गद्दाफी ने इसमें हिस्सा लिया था। लीबिया भी भारत का पुराना दोस्त था। जिससे भारत कच्चा तेल भी खरीदता था। फिर साल 2011 में लीबिया में ‘अरब स्प्रिंग’ के नाम पर गद्दाफी के शासन के खिलाफ विद्रोह हो गया। गद्दाफी को भागकर छिपना पड़ा, लेकिन एक दिन लीबिया के पूर्व शासक को पकड़ लिया गया और अक्टूबर 2011 में मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हो गई। लीबिया में बड़े पैमाने पर भारतीय रहते थे। वहां हालात बिगड़ने पर 15000 से ज्यादा भारतीयों को वापस देश लाया गया। गद्दाफी की हत्या पर भारत की चुप्पी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी छपी थी।

अब आपको बताते हैं कि एक देश के लंबे वक्त तक शासक रहे और गुट निरपेक्ष देशों में शामिल लीबिया के गद्दाफी की हत्या के बाद कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने क्या रुख दिखाया? गद्दाफी की हत्या पर कांग्रेस की यूपीए सरकार ने चुप्पी साध ली। यूपीए सरकार के उस दौर में विदेश मंत्रालय ने मुअम्मर गद्दाफी की हत्या पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया। उसने सिर्फ लीबिया में उस वक्त खराब हालात पर चिंता जताई और वहां शांति, स्थिरता और राजनीतिक बदलाव पर बयान जारी किया। कांग्रेस नीत भारत सरकार ने उस वक्त लीबिया में बनी नेशनल ट्रांजिशनल काउंसिल (एनटीसी) की मदद करने की इच्छा जताई। ताकि लीबिया का पुनर्निर्माण हो सके। यहां तक कि उस वक्त भारत एनटीसी को मान्यता देने वाले आखिरी देशों में था।

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