क्या हैं राजस्थान के ओरण?, जिनको बचाने का मुद्दा आंदोलन से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा
नई दिल्ली। राजस्थान में ओरण बचाओ आंदोलन चलता रहा है। ओरण बचाओ अब सिर्फ आंदोलन नहीं रह गया है। ओरण बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी दस्तक दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ राजस्थान के ओरण बचाने के बारे में सुनवाई करने वाली है। आपको बताते हैं कि आखिर ओरण बचाओ आंदोलन क्यों हो रहा है और इस आंदोलन को किसने शुरू किया।
ओरण बचाओ आंदोलन का उद्देश्य राजस्थान के जैसलमेर समेत राज्य के पश्चिमी इलाके की पारंपरिक जमीन को सौर और पवन ऊर्जा के लिए निजी कंपनियों को देने से रोकना है। राजस्थान के इन इलाकों के लोग रेगिस्तान में हरियाली वाली जमीन को ओरण कहते हैं और इसे पवित्र मानते हैं। ओरण बचाओ आंदोलन की शुरुआत सुमेर सिंह सांवता के नेतृत्व में हुई। आंदोलनकारियों ने ओरण बचाओ आंदोलन के दौरान राजस्थान में पाकिस्तान सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर से 27 किलोमीटर की पदयात्रा शुरू की। जिससे ओरण बचाओ का मसला जन आंदोलन बन गया। आंदोलनकारियों का कहना है कि ओरण न सिर्फ पशुपालन के लिए जरूरी हैं, बल्कि ये पारिस्थितिकी को भी बचाए रखते हैं।
ओरण को स्थानीय लोग ‘ईश्वर का बगीचा’ भी कहते हैं। आंदोलन करने वालों का कहना है कि ओरण का मामला सिर्फ जंगल की जमीन ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों के तहत इनको संवैधानिक संरक्षण दिलाने का निर्णायक युद्ध है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ये विचार कर फैसला सुनाएगी कि ओरण को लोक देवताओं की जीवित देवभूमि माना जाए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला ओरण मामला ही नहीं, देश के तमाम अन्य जंगलों और हरियाली वाले इलाकों को बचाने के लिए भी बहुत अहम होने वाला है।
