दिल्ली की लाठियों की गूंज अब यूपी में: राकेश टिकैत के ऐलान से मुजफ्फरनगर बना आंदोलन का नया मोर्चा, किसान पंचायत अनिश्चितकालीन धरने में बदली
रविन्द्र बंसल –
मुजफ्फरनगर। दिल्ली में छात्रों के आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई की गूंज अब उत्तर प्रदेश की सियासत और किसान आंदोलन में साफ सुनाई देने लगी है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने दिल्ली की घटना को लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट बताते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सरकार के खिलाफ नए संघर्ष का बिगुल फूंक दिया। संयुक्त किसान मोर्चा की पहल पर मुजफ्फरनगर कचहरी परिसर में बुलाई गई किसान पंचायत को किसानों की सहमति से अनिश्चितकालीन धरने में बदलने की घोषणा कर दी गई। इसके साथ ही यह संकेत भी दे दिया गया कि यदि सरकार ने छात्रों, किसानों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अपना रुख नहीं बदला तो आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलकर पूरे प्रदेश में फैलाया जाएगा।
धरने को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने दिल्ली में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि “यह लाठीचार्ज नहीं, बल्कि छात्रों के आंदोलन को चार्ज करने वाली कार्रवाई साबित हुई है।” उन्होंने कहा कि जब रोजगार, भर्ती, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर युवा सड़क पर उतरते हैं और उनके जवाब में लाठियां चलती हैं, तो इससे आक्रोश कम नहीं होता बल्कि और तेज होता है। टिकैत ने कहा कि युवाओं की आवाज को दबाने का हर प्रयास लोकतंत्र को कमजोर करता है और इसका असर केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचेगा।
मुजफ्फरनगर की कचहरी में जुटे किसानों ने भी दिल्ली की घटना पर नाराजगी जताई और छात्र आंदोलन के समर्थन में आवाज बुलंद की। पंचायत में मौजूद किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बलपूर्वक रोकने की कोशिश की गई, जिससे लोकतांत्रिक विरोध की भावना आहत हुई। इसी के विरोध में पंचायत को अनिश्चितकालीन धरने में बदलने का फैसला लिया गया। धरना स्थल पर मौजूद किसानों ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन केवल किसानों का नहीं बल्कि युवाओं, मजदूरों और आम नागरिकों के अधिकारों की लड़ाई के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा।
राकेश टिकैत ने घोषणा की कि संयुक्त किसान मोर्चा उत्तर प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर किसान पंचायतों का आयोजन करेगा। इन पंचायतों के माध्यम से किसानों, मजदूरों और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश के हर जिले में लोगों को यह बताया जाएगा कि रोजगार, शिक्षा, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
धरने के दौरान राकेश टिकैत ने केंद्र सरकार की कृषि एवं व्यापार नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विदेशी देशों के साथ कृषि व्यापार समझौते, मक्का और दुग्ध क्षेत्र से जुड़े फैसले, बिजली संशोधन विधेयक तथा भूमि अधिग्रहण जैसे विषय किसानों की आजीविका पर दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। उनका आरोप था कि किसानों की आशंकाओं को दूर करने के बजाय सरकार संवाद से बचती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि यदि किसानों की आवाज नहीं सुनी गई तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े सवाल पर भी टिकैत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय समाज की धरोहर होते हैं। उन्होंने कहा कि “विश्वविद्यालय बनाए जाते हैं, तोड़े नहीं जाते।” उनके अनुसार यदि किसी शिक्षण संस्थान को नुकसान पहुंचाने जैसी कार्रवाई होती है तो किसान संगठन उसका विरोध करेंगे, क्योंकि शिक्षा संस्थानों की रक्षा लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है।
मुजफ्फरनगर से शुरू हुआ यह घटनाक्रम राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान संगठनों का प्रभाव लंबे समय से निर्णायक माना जाता है। ऐसे में यदि छात्र आंदोलन, किसान आंदोलन और रोजगार जैसे मुद्दे एक साझा मंच पर आते हैं तो इसका असर आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन का विस्तार और सरकार की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों की दिशा तय करेगी।
वहीं, प्रशासन और सरकार की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का भी इंतजार है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और उससे जुड़े आरोपों पर सभी पक्षों का सामने आना आवश्यक माना जाता है। फिलहाल मुजफ्फरनगर से उठी यह आवाज प्रदेश की राजनीति और किसान आंदोलन दोनों के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।
