‘जहां राम हैं वहां विश्राम है, जहां कृष्ण हैं वहां आनंद है, बस मन को वहीं टिका लो’: अनमोल श्री जी
नरेंद्र बंसल-
आज की भागदौड़ और तनावपूर्ण जीवनशैली के बीच अंतर्राष्ट्रीय कथावाचक श्रद्धेय अनमोल श्री जी ने लोगों को आंतरिक शांति और आनंद का आध्यात्मिक सूत्र बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस सुख और शांति की तलाश में संसार में भटकता रहता है, उसका वास्तविक आधार प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके चरणों में मन का समर्पण है।
अनमोल श्री जी ने कहा, “जहां राम हैं वहां विश्राम है, जहां कृष्ण हैं वहां आनंद है, बस मन को वहीं टिका लो।” उन्होंने श्रीराम के नाम की महिमा बताते हुए कहा कि ‘राम’ केवल नाम नहीं, बल्कि मर्यादा, स्थिरता और शांति का प्रतीक हैं। संसार में धन, वैभव और प्रतिष्ठा मिलने के बावजूद यदि मन को स्थिरता नहीं मिली तो जीवन में वास्तविक विश्राम संभव नहीं है।
श्रीकृष्ण के स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि आज मनुष्य मनोरंजन को आनंद समझने की भूल कर रहा है। मनोरंजन क्षणिक होता है, जबकि आध्यात्मिक आनंद स्थायी होता है। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण आनंद के स्रोत हैं और उनके चरणों में मन लगाने से निराशा के बीच भी जीवन में सकारात्मकता और उत्साह का संचार होता है।
उन्होंने कहा कि मन का भटकाव ही मनुष्य के अधिकांश दुखों का मूल कारण है। इंद्रियों के पीछे भागने वाला मन व्यक्ति को अशांति की ओर ले जाता है। ऐसे में आवश्यकता मन को दबाने की नहीं, बल्कि उसकी दिशा बदलने की है। मन को संसार की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के चरणों में लगाना ही शांति का मार्ग है।
युवाओं को संदेश देते हुए अनमोल श्री जी ने कहा कि अध्यात्म जीवन से भागने का नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला है। उन्होंने कहा कि कर्म करते हुए भी यदि मन ईश्वर से जुड़ा रहे तो वही कर्म पूजा का स्वरूप ले लेता है।
उनका संदेश “जहां राम हैं वहां विश्राम है, जहां कृष्ण हैं वहां आनंद है” लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
