ग्लेशियर वाली इन झीलों से भारत में भी आपदा संभव!, आईआईटी मंडी की रिसर्च ने खतरे की घंटी बजाई
नई दिल्ली। चीन में एक ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने से नेपाल में 26 अगस्त 2026 को भयावह बाढ़ में तमाम लोगों को जान गंवानी पड़ी। नेपाल में बाढ़ के बाद हजारों लोग अब भी लापता हैं। अब आईआईटी मंडी की एक रिसर्च में कहा गया है कि ग्लेशियर वाली झीलों के कारण भारत में भी बड़ी आपदा आने की आशंका है। आईआईटी मंडी ने करीब 200 ग्लेशियर वाली झीलों के बारे में शोध किया। उसने पाया कि 9 से 12 ऐसी झीलें खतरा बन सकती हैं।
आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डेरिक्स पी. शुक्ला के मुताबिक हिमाचल में ग्लेशियर से बनी कई झीलों का आकार बीते 10 साल में 30 से 60 फीसदी तक बढ़ा है। इससे भविष्य में ग्लेशियर वाली झीलों से बाढ़ का खतरा है। उन्होंने कहा कि हिमालय में लगातार पर्यटन और प्रदूषण बढ़ रहा है। जिसकी वजह से ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं। वाहनों के आने-जाने और इंसानों की गतिविधि से कार्बन और धूल ग्लेशियरों पर जमा होती है। जिससे ग्लेशियर की बर्फ पर काली परत बनती है। काला रंग सूरज की गर्मी को ज्यादा लेता है। जिससे ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है।
उन्होंने बताया कि हिमालय में धरती के नीचे की चट्टान, मिट्टी वगैरा भी अस्थिर हो जाती है। इसे पर्माफ्रॉस्ट कहते हैं। इससे पहाड़ों में भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बनता है। प्रोफेसर शुक्ला का कहना है कि नेपाल में भयावह बाढ़ ग्लेशियर टूटने और पर्माफ्रॉस्ट के खिसकने के कारण तबाही लेकर आई। उन्होंने कहा कि पहाड़ों में कनेक्टिविटी अच्छी बात है, लेकिन इसे नियंत्रित करना चाहिए। साल भर पर्यटकों के आने से ग्लेशियर पर धूल जम रही है। उन्होंने कहा कि नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी यानी एनडीएमए ने खतरे वाली घेपन झील, वासुकी झील, बास्पा के पास झील और काशांग झील की पहचान की है, जिन पर तुरंत ध्यान देना चाहिए। आईआईटी मंडी ने ऐसी ही 9 बहुत खतरे वाली झीलों की पहचान की है। सबसे बड़ा खतरा घेपन, योचे और काली कुंड झीलों से है। इनका आकार बढ़ रहा है।
