मेधा पाटकर को दिल्ली हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, एलजी वीके सक्सेना की ओर से दायर आपराधिक मानहानि मामले में सजा बरकरार
नई दिल्ली। दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा दायर आपराधिक मानहानि मामले में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका लगा है। उच्च न्यायालय ने मेधा पाटकर को दोषी ठहराए जाने वाले निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। साकेत कोर्ट ने पिछले साल मेधा पाटकर को मानहानि का दोषी पाया था और उन्हें पांच महीने की जेल तथा 10 लाख जुर्माने की सजा सुनाई थी। मेधा पाटकर ने इस आदेश को साकेत के सेशंस कोर्ट में चुनौती दी थी मगर वहां से भी उनकी याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, मगर वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट की जज शालिंदर कौर ने आज अपने फैसले में कहा कि मेधा पाटकर को दोषी ठहराने के निचली और अपीलीय अदालतों के फैसलों में कोई अवैधता नहीं थी। बार एंड बेंच के अनुसार जज ने हालांकि पाटकर को परिवीक्षा पर रिहा करने के सत्र अदालत के फैसले को बरकरार रखा। साथ ही, पाटकर को राहत देते हुए, अदालत ने उस शर्त को संशोधित कर दिया जिसके तहत उन्हें हर तीन महीने में निचली अदालत में पेश होना पड़ता था। उच्च न्यायालय ने कहा कि वह ऑनलाइन पेश हो सकती हैं या किसी वकील के माध्यम से उनका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। इससे पहले सत्र न्यायालय ने इसी साल 8 अप्रैल को मेधा पाटकर को राहत देते हुए उन्हें 25,000 रुपये के परिवीक्षा बांड और इतनी ही राशि की जमानत पर एक वर्ष की अवधि के लिए परिवीक्षा पर रिहा कर दिया था। साथ ही उन पर लगाए गए 10 लाख रुपये के जुर्माने को भी 1 लाख रुपये कर दिया था।
एलजी वीके सक्सेना के द्वारा साल 2000 में मेधा पाटकर के खिलाफ मानहानि का यह मामला दर्ज कराया गया था। उस समय सक्सेना अहमदाबाद स्थित एनजीओ नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर ने 25 नवंबर 2000 को “देशभक्त का असली चेहरा” शीर्षक वाले एक प्रेस नोट में कहा था कि वीके सक्सेना देशभक्त नहीं कायर हैं। इसके अलावा पाटकर ने सक्सेना पर हवाला लेन-देन में भी शामिल होने समेत कई गंभीर आरोप लगाए थे।
