February 14, 2026

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असम सरकार का नया नियम, संदिग्ध अगर 10 दिन में नागरिकता का सबूत नहीं दे सका तो घुसपैठिया माना जाएगा

गुवाहाटी। असम की बीजेपी सरकार ने प्रवासी (असम से निष्कासन) एक्ट 1950 के तहत जिलों के आयुक्तों (डीएम) को अधिकार दिया है कि वे राज्य में संदिग्ध घुसपैठियों को 10 दिन में भारत की नागरिकता साबित करने के लिए सबूत देने को कह सकते हैं। ऐसा न करने पर संबंधित को घुसपैठिया मानते हुए डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा। जिसके बाद ऐसे लोगों को उनके देश वापस भेजा जाएगा। असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने कैबिनेट की बैठक के बाद मीडिया को ये जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने मौजूदा एसओपी को दरकिनार कर जिला आयुक्तों को अधिकार देने का फैसला किया है।

असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने कहा कि जिला आयुक्त अब संदिग्ध विदेशियों को 10 दिन की मोहलत देंगे कि वे खुद को भारत का नागरिक साबित करने का सबूत दें। इस समयसीमा में सबूत न देने वालों के लिए जिला आयुक्त निकासी का आदेश जारी कर सकेंगे। अब तक संदिग्ध विदेशियों का मामला विदेशी न्यायाधिकरण में लाया जाता रहा है। नए एसओपी के तहत अब असम के जिला उपायुक्त ही अंतिम फैसला लेने के हकदार बनाए गए हैं। जून में ही असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने कहा था कि राज्य में प्रवासी (असम से निष्कासन) एक्ट 1950 लागू किया जाएगा। उन्होंने अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट बेंच के एक फैसले के आधार पर इस एक्ट को लागू करने की बात कही थी।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने नागरिकता एक्ट की धारा 6ए की संवैधानिकता बरकरार रखी थी। जिसके तहत किसी के लिए 24 मार्च 1971 तक असम में प्रवेश वैध किया गया था। इस तारीख के बाद असम में प्रवेश करने वालों को अवैध अप्रवासी मानने की बात कही गई थी। ताजा फैसले से विदेशी न्यायाधिकरण के पास अब अवैध घुसपैठियों के मामले नहीं जाएंगे। असम की हिमंत बिस्व सरमा सरकार ने 1950 के जिस एक्ट की नई एसओपी लागू करने का फैसला किया है, उसे असम की तत्कालीन सरकार के दबाव में जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने पास कराया था। एक्ट के तहत तय समयसीमा में घुसपैठियों को असम या भारत से निकालने का प्रावधान है। 1 मार्च 1950 को एक्ट पास हुआ था, लेकिन एक महीने बाद ही लियाकत अली खान और नेहरू के बीच समझौते की वजह से इस कानून के अमल पर रोक लगा दी गई थी।

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