‘दहेज के खिलाफ बनाया गया कानून बेअसर…कई मामलों में दुरुपयोग भी हो रहा’, सुप्रीम कोर्ट का दिखा कड़ा रुख
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा पर कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि दहेज की कुप्रथा आज भी व्यापक है। इसे खत्म करना संविधान के तहत जरूरी और सामाजिक जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज के खिलाफ बनाया गया कानून बेअसर हो गया है। कई मामलों में दहेज निरोधक कानून का दुरुपयोग भी देखने को मिल रहा है। बेंच ने कहा कि कानून के भरोसे ही इस सामाजिक बुराई से निपटना संभव नहीं है। इसके लिए समाज, सरकार और संस्थानों को सामूहिक तौर पर कोशिश करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि विवाह में कोई भी पक्ष दूसरे के अधीन नहीं, बल्कि बराबर हैं। कोर्ट ने कहा कि समाज के हर स्तर पर ये भावना पहुंचनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज प्रथा किसी खास धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं, ये अलग-अलग आस्थाओं और समुदायों में फैली हुई है। कोर्ट ने कहा कि दहेज विरोधी कानून प्रभावी न होने के साथ ही धारा 498-ए और 304-बी के प्रावधान का गलत उद्देश्य से इस्तेमाल हो रहा है। इसकी वजह से अदालतों पर दबाव बनता है। साथ ही पीड़ितों को न्याय भी नहीं मिल पाता। सुप्रीम कोर्ट ने 24 साल पुराने दहेज हत्या के मामले में फैसला सुनाते हुए ये बातें कही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरफ से आरोपियों को बरी करने का फैसला भी पलट दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से कहा कि वे दहेज हत्या और क्रूरता से संबंधित लंबित केस की संख्या, सबसे पुराने से लेकर इस तरह के दर्ज नए मामलों का आकलन कर उनको जल्द से जल्द निपटाएं। जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 94 साल उम्र की महिला को जेल नहीं भेजा, लेकिन अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुना दी। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार दहेज निरोधक कानून के दुरुपयोग की बात कह चुका है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने ही ये व्यवस्था भी दी थी कि 498-ए का केस दर्ज होने के बाद जांच कर पुलिस गिरफ्तार करेगी। कानून में आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान किया गया था। जिसकी वजह से पीड़ित महिला के केस दर्ज कराते ही सभी को पुलिस पहले गिरफ्तार और फिर जांच करती थी।
