February 17, 2026

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कांग्रेस की कर्नाटक सरकार के सर्वे में 83.61 फीसदी जनता ने ईवीएम पर जताया विश्वास, बीजेपी ने राहुल गांधी को घेरा

नई दिल्ली। कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने ईवीएम को लेकर एक सर्वे कराया और इसके नतीजे राहुल गांधी के दावों से एकदम उलट हैं। प्रदेश की 83.61 फीसदी जनता ने ईवीएम पर विश्वास जताया है जिसमें से 69.39 फीसदी लोगों ने माना है कि ईवीएम सटीक नतीजे देती है, जबकि 14.22 फीसदी ने पूरी मजबूती के साथ कहा कि वोटिंग मशीन विश्वसनीय है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी जो बार-बार चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता और ईवीएम को लेकर सवाल उठाते रहते हैं अब इस सर्वे के नतीजों के आधार पर बीजेपी ने उन पर निशाना साधा है। बीजेपी ने कांग्रेस पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।

लोकसभा इलेक्शन 2024- इवैल्यूएशन ऑफ इंडलाइन सर्वे ऑफ नॉलेज, एटीट्यूट एंड प्रैक्टिस ऑफ सिटिजन्स नाम का यह सर्वे कर्नाटक के 102 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया। कर्नाटक सरकार ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अंबुकुमार के जरिए कराए गए सर्वे में बेंगलुरु, बेलगावी, कलबुर्गी और मैसूरु प्रशासनिक डिवीजनों के 5,100 लोगों को शामिल किया गया। वहीं बीजेपी नेता और कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने कहा कि वर्षों से राहुल गांधी देशभर में घूम-घूमकर एक ही कहानी सुनाते आ रहे हैं कि भारत का लोकतंत्र खतरे में है, ईवीएम भरोसेमंद नहीं है, हमारी संस्थाओं पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन कर्नाटक के लोगों को चुनावों पर भरोसा है, लोगों को ईवीएम पर भरोसा है और लोगों को भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा है। यह सर्वेक्षण कांग्रेस के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

बीजेपी नेता ने कहा, जहां नागरिक आत्मविश्वास दिखा रहे हैं, वहीं कांग्रेस संदेह जता रही है। जहां मतदाता परिपक्वता दिखा रहे हैं, वहीं कांग्रेस असुरक्षा दिखा रही है। उन्होंने कहा कि इस स्पष्ट जनविश्वास के बावजूद, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार कर्नाटक को पीछे ले जाने का विकल्प चुन रही है – मतपत्रों के माध्यम से स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा करके, एक ऐसी प्रणाली को पुनर्जीवित कर रही है जो हेराफेरी, देरी और दुरुपयोग के लिए जानी जाती है। यह नाटक लोकतंत्र की चिंता से नहीं उपजा है, यह चुनावी फैसले के डर से प्रेरित है। कांग्रेस संस्थाओं पर तभी सवाल उठाती है जब वह हार जाती है। जब वह जीतती है, तो उसी व्यवस्था का जश्न मनाती है। यह सिद्धांतवादी राजनीति नहीं, यह सुविधापूर्ण राजनीति है और अब कोई भी मनगढ़ंत कहानी इस सच्चाई को छिपा नहीं सकती।

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