यूजीसी एक्ट लागू होने के बाद देश भर में विरोध. सडकों पर अगड़ी जातियां
यूजीसी एक्ट लागू होने के बाद जनरल कैटेगरी के बीच विरोध की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। लोग अपने भविष्य और अवसरों को लेकर उठी शंकाओं के कारण सवाल कर रहे हैं और इस विषय पर स्पष्टता चाहते हैं। यदि सरकार को विश्वास है कि यह निर्णय सबके हित में है, तो आवश्यक है कि इसे सरल और स्पष्ट शब्दों में समझाया जाए। आरोप है कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के खिलाफ झूठे मामले दर्ज होने का डर है और ये भेदभावपूर्ण हैं।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘पदोन्नति इक्विटी (समानता) नियम, 2026’ के खिलाफ, विशेषकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में सवर्ण जातियों और छात्र संगठनों ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। यह आक्रोश नए नियमों में समानता के प्रावधानों, जैसे कि जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में OBC को शामिल करना और ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (उल्टे भेदभाव) की आशंका के चलते है।
इस विरोध के कारण यूपी में कई स्थानीय भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस्तीफा दे दिया है।
क्या हैं UGC के नए इक्विटी नियम?
UGC ने इस साल इक्विटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशंस 2026 लागू किए हैं. इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भेदभाव को रोकना और सभी छात्रों व कर्मचारियों को समान अवसर देना बताया गया है.
इन नियमों के तहत हर हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट को Equal Opportunity Centre (समान अवसर केंद्र) बनाना होगा. भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के लिए विशेष समितियां गठित करनी होंगी और 24 घंटे की हेल्पलाइन सेवा भी शुरू करनी होगी. इसके अलावा, तय समय सीमा में शिकायतों पर कार्रवाई भी करनी होगी और अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो UGC उस पर कार्रवाई या जुर्माना भी लगा सकता है.
छात्रों और शिक्षकों ने क्यों किया विरोध?
इन नियमों के खिलाफ सबसे पहले छात्र और शिक्षक सामने आए. उनका कहना है कि नियम बहुत अस्पष्ट और बहुत ज्यादा व्यापक हैं. आलोचकों का मानना है कि नियमों में कई बातें साफ नहीं लिखी गई हैं. संस्थानों की समितियों को बहुत ज्यादा अधिकार दिए गए है. ऐसे में झूठे आरोपों से बचाव के लिए कोई मजबूत सुरक्षा व्यवस्था नहीं है. अलग-अलग कॉलेजों में नियमों का गलत या असमान इस्तेमाल हो सकता है और इसी वजह से कई राज्यों में छात्रों और शिक्षकों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट में होगी यूजीसी नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी है. बुधवार को शीर्ष अदालत में इस याचिका का उल्लेख किया गया, जिसमें दावा किया गया है कि यूजीसी के नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव की स्थिति पैदा कर सकते हैं. यह मामला राहुल देवन और अन्य बनाम केंद्र सरकार के नाम से दायर किया गया है.
कानूनी वेबसाइट बार एंड बेंच के अनुसार, याचिकाकर्ता के वकील ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के समक्ष कहा कि इन नियमों से जनरल कैटेगरी के छात्रों के हित प्रभावित हो सकते हैं. इस पर CJI ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत हालात से अवगत है और याचिका में मौजूद तकनीकी खामियों को दूर करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि मामले को औपचारिक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा.
आनंद रंगनाथन ने UGC के इक्विटी नियमों पर उठाए सवाल
साइंटिस्ट, लेखक और कमेंटेटर आनंद रंगनाथन ने UGC 2026 के भेदभाव-विरोधी नियमों की कड़ी आलोचना की है और सोशल मीडिया पर उन्हें अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण बताया है. रंगनाथन ने तर्क दिया कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ गलत तरीके से भेदभाव करते हैं, क्योंकि उन्हें मुख्य सुरक्षा से बाहर रखा गया है. माइक्रो ब्लॉगिंग साइट (X) पर उन्होंने लिखा: “सामान्य वर्ग के छात्रों को उन पापों के लिए सजा देना जो उन्होंने नहीं किए, यह अन्याय को ठीक करना नहीं है, बल्कि इसे और बढ़ाना है.”
उन्होंने झूठी शिकायतों पर सजा देने के लिए किसी प्रावधान की कमी की भी आलोचना की, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे दुरुपयोग हो सकता है और निर्दोष छात्रों को नुकसान पहुंच सकता है.
उन्होंने मुख्य आपत्तियां बताईं:-
1) जातिगत भेदभाव के शिकार की परिभाषा में सामान्य वर्ग को शामिल नहीं किया गया है.
2) इक्विटी समिति की संरचना में सामान्य वर्ग का कोई जिक्र नहीं है.
3) झूठी शिकायतों पर सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है.
उनकी आलोचना ने UGC के इक्विटी फ्रेमवर्क के लागू होने और उसके प्रभाव पर चल रही राष्ट्रीय चर्चा में और इजाफा किया है.
विरोध के मुख्य बिंदु और कारण:
नियमों की प्रकृति: 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में SC, ST, और OBC के खिलाफ होने वाले जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए हैं, जिसमें 24×7 हेल्पलाइन और समिति बनाना अनिवार्य है।
मुख्य आपत्तियां: प्रदर्शनकारियों का मानना है कि ये नियम सामान्य वर्ग (Upper Caste) के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ हैं, जो उन्हें “दूसरे दर्जे का नागरिक” बना सकते हैं।
प्रदर्शनकारी इन नियमों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं और इसे असंवैधानिक करार दे रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई है।
