‘समाज की भलाई या सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते’, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान पीठ सबरीमाला मामले में सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान अहम बात कही। कोर्ट ने कहा कि समाज की भलाई और सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते और न ही उसकी जरूरी प्रथाओं को छीना जा सकता है। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट के सामने सबसे मुश्किल ये तय करना है कि लाखों लोगों की मान्यता को गलत या भ्रामक कैसे ठहराया जाए।
वहीं, पीठ में शामिल जस्टिस एमएम सुंदरेश ने कहा कि क्या कोर्ट लाखों लोगों का पक्ष सुने बिना ऐस सवालों पर फैसला सुना सकता है। पीठ की सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि ऐसी जनहित याचिका पर उस वक्त तक विचार नहीं करना चाहिए, जब तक कि उसे दाखिल करने वाले का सीधा हित न जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि सामाजिक भलाई या सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते। सुनवाई के दौरान संविधान पीठ के सदस्य जस्टिस जयमाल्य बागची ने ये सवाल उठाया कि क्या किसी धर्म की जरूरी प्रथाओं को कानूनी तौर से बदला नहीं जा सकता?
इस मामले में त्रावणकोर देवोस्वम बोर्ड के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 25 की धारा 2 के खंड ब और अनुच्छेद 26 के खंड ब में संबंध है। उन्होंने अपील की कि दोनों की व्याख्या संतुलित तरीके से की जाए। अनुच्छेद 25 धार्मिक आजादी और अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपना प्रबंधन खुद करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं, अनुच्छेद 25(2)(ब) सरकार को सामाजिक सुधार के लिए कानून तैयार करने और सभी वर्गों को धार्मिक स्थलों में जाने की मंजूरी देता है। सिंघवी ने कहा कि कानून बनाते वक्त तय करना चाहिए कि धर्म की मूल पहचान बनी रहे। अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि ये तय करना कोर्ट का काम नहीं कि कौन सी धार्मिक प्रथाएं जरूरी हैं और कौन सी नहीं।
