‘कानून में बदलाव कर गर्भपात की समयसीमा बढ़ानी चाहिए’, जानिए किस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कही ये बात
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गर्भपात के एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से कहा कि कानून में संशोधन पर उसे विचार करना चाहिए। ताकि रेप की पीड़ित महिलाओं को 20 हफ्ते से ज्यादा वक्त के बाद भी गर्भपात की अनुमति मिल सके। इस मामले में रेप पीड़ित 15 साल की नाबालिग है और उसकी 30 हफ्ते के गर्भ को गिराने की मंजूरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान केंद्र से कानून बदलने पर विचार के लिए कहा।
सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि जब रेप की वजह से गर्भ हुआ, तो गर्भपात के लिए समयसीमा नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कानून को वक्त के हिसाब से बदलना चाहे। कोर्ट ने कहा कि अगर बच्ची को गर्भपात की मंजूरी न दी गई, तो उसे जिंदगीभर मानसिक आघात का सामना करना होगा। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर मां को स्थायी शारीरिक नुकसान नहीं होता, तो गर्भपात करना चाहिए। कोर्ट ने दिल्ली एम्स से कहा कि वो इस मुद्दे पर बच्ची के माता-पिता को परामर्श दे। क्योंकि अंतिम फैसला बच्ची और उसके परिवार का होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि पहले ही तमाम बच्चे गोद लेने के लिए हैं। कई बच्चे बेसहारा सड़कों पर रहते हैं और बच्चों की खरीद-फरोख्त करने वाले माफिया भी सक्रिय हैं। कोर्ट ने कहा कि 15 साल की बच्ची को अनचाहा गर्भ है। उसे पढ़ना है, लेकिन हम उसे मां बनने के लिए मजबूर कर रहे। कोर्ट ने कहा कि सोचिए उसने कितना दर्द और अपमान सहा है। इससे पहले एम्स की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि 30 हफ्ते का भ्रूण जीवित शिशु बन चुका है और इस हालत में गर्भपात संभव नहीं। उन्होंने गंभीर विकृतियां होने और नाबालिग को स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने की बात भी कही। इस पर सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा कि गर्भपात का फैसला इस बच्ची और उसके माता-पिता की इच्छा पर निर्भर करेगा। कोर्ट ने मीडिया से भी इस मामले की रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता बरतने और सुनवाई में कही गई हर बात को रिकॉर्ड न करने का आग्रह किया है।
