हर की पौड़ी पर आस्था का महासागर, शिवभक्ति में डूबा देश
रविन्द्र बंसल-
हरिद्वार। श्रावण मास की पावन बेला में धर्मनगरी हरिद्वार की पवित्र हर की पौड़ी पर सोमवार को ऐसा दृश्य देखने को मिला, मानो आस्था स्वयं गंगा की लहरों के साथ प्रवाहित हो रही हो। दूर-दूर तक केसरिया वस्त्रों में सजे शिवभक्तों का अथाह जनसैलाब, हाथों में सजी कांवड़, कंधों पर गंगाजल और मुख पर भगवान भोलेनाथ का नाम—यह दृश्य भारत की सनातन परंपरा की जीवंत पहचान बन गया। “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के गगनभेदी उद्घोषों से पूरी धर्मनगरी शिवमय हो उठी।
हर की पौड़ी पर लाखों श्रद्धालुओं ने मां गंगा में आस्था की डुबकी लगाकर अपनी कांवड़ों में पवित्र गंगाजल भरा और भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए अपने-अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। हर ओर भक्ति, विश्वास और समर्पण का ऐसा अद्भुत संगम दिखाई दिया, जिसने हर आने वाले श्रद्धालु के मन को भावविभोर कर दिया। गंगा तट से लेकर राष्ट्रीय राजमार्गों तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें यह संदेश देती रहीं कि सनातन संस्कृति की जड़ें आज भी उतनी ही मजबूत हैं, जितनी सदियों पहले थीं।
कांवड़ यात्रा के मार्गों पर सेवा की भारतीय परंपरा भी पूरे वैभव के साथ दिखाई दी। सामाजिक, धार्मिक और स्वयंसेवी संगठनों ने विशाल सेवा शिविर स्थापित कर श्रद्धालुओं के लिए भोजन, शीतल पेयजल, चिकित्सा सहायता, विश्राम और प्राथमिक उपचार की निःशुल्क व्यवस्था की। सेवा और समर्पण का यह भाव कांवड़ मेले की सबसे बड़ी पहचान बनकर उभरा।
श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए हैं। पुलिस, अर्द्धसैनिक बल, स्वास्थ्य विभाग, अग्निशमन दल और आपदा राहत टीमें लगातार मुस्तैद हैं। ड्रोन कैमरों, सीसीटीवी निगरानी और आधुनिक नियंत्रण कक्षों के माध्यम से हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है, ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं की यात्रा सुरक्षित, सुचारु और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे कांवड़ियों का कारवां दिल्ली, गाजियाबाद, लोनी, ट्रॉनिका सिटी, मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जनपदों की ओर निरंतर बढ़ रहा है। भगवा ध्वजों से सजे मार्ग, शिवभक्ति के भजनों की गूंज और श्रद्धालुओं का अनुशासन इस यात्रा को विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।
कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, सेवा, त्याग, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का विराट महापर्व है। हर की पौड़ी पर उमड़ा आस्था का यह महासागर यह प्रमाणित करता है कि आधुनिकता के इस दौर में भी भारत की सांस्कृतिक आत्मा भगवान शिव की भक्ति में उतनी ही दृढ़ता से रची-बसी है। श्रद्धा का यह प्रवाह आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का कार्य करता रहेगा।
हरिद्वार की हर की पौड़ी से उठी “बोल बम” की गूंज केवल गंगा तट तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने पूरे देश को भक्ति, विश्वास, सेवा और सांस्कृतिक एकता के अद्भुत सूत्र में पिरो दिया।
