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घायल पशुओं की पनाहगाह पर चला बुलडोजर, जागृति मिश्रा के आरोपों से दिल्ली में हड़कंप; एमसीडी का जेई निलंबित

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रविन्द्र बंसल –

नई दिल्ली। घायल, दिव्यांग और लकवाग्रस्त बेजुबान पशुओं को आश्रय देने के उद्देश्य से गौशाला और निःशुल्क पशु चिकित्सालय तैयार कर रहीं पशु कल्याण कार्यकर्ता जागृति मिश्रा का मामला दिल्ली में चर्चा का विषय बन गया है। उत्तर-पश्चिम दिल्ली के कंझावला क्षेत्र के निजामपुर गांव में निर्माणाधीन पशु आश्रय स्थल की चारदीवारी तोड़े जाने के बाद जागृति मिश्रा के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुए। मामले ने तूल पकड़ा तो मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने उनसे मुलाकात की, पुलिस को कार्रवाई के निर्देश दिए और नगर निगम के एक जूनियर इंजीनियर को निलंबित कर दिया गया। हालांकि, धमकी देने, पैसे मांगने और तोड़फोड़ के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की मौजूदा स्थिति अब भी इस प्रकरण का अहम सवाल है।

बेजुबानों के लिए बना रही थीं आश्रय, चारदीवारी तोड़े जाने से विवाद

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जागृति मिश्रा स्ट्रीट वर्ल्डज ट्रस्ट के माध्यम से घायल और बेसहारा पशुओं की देखभाल करती हैं। जानकारी के अनुसार, उनके संरक्षण में 100 से अधिक कुत्ते और अन्य पशु हैं। पशुओं की बढ़ती संख्या और बेहतर उपचार की जरूरत को देखते हुए उन्होंने निजामपुर गांव में स्थायी पशु आश्रय स्थल और निःशुल्क पशु चिकित्सालय बनाने की योजना पर काम शुरू किया था।

इस परियोजना के निर्माण के लिए उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से आर्थिक सहयोग भी मांगा था। जागृति के अनुसार, निर्माण पर लगभग 70 लाख रुपये खर्च किए जा चुके थे। इसमें उनके अपने संसाधनों के साथ लोगों से प्राप्त सहयोग भी शामिल था। यह राशि उनके द्वारा बताई गई लागत है, इसका स्वतंत्र वित्तीय सत्यापन सार्वजनिक रिपोर्टों में सामने नहीं आया है।

24 अक्टूबर 2026 को निर्माणाधीन परिसर की चारदीवारी तोड़े जाने की घटना सामने आई। जागृति ने आरोप लगाया कि कुछ लोग जेसीबी मशीन लेकर पहुंचे और दीवार गिरा दी। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पशुओं के लिए आश्रय स्थल तैयार करने में लगी मेहनत और लोगों के सहयोग से निर्मित ढांचे को गिराने से पहले नियमानुसार नोटिस और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

पैसे मांगने और धमकाने के आरोप, जांच में सामने आएगा सच

जागृति मिश्रा ने आरोप लगाया कि गौशाला के निर्माण को लेकर उन्हें धमकाया गया और उनसे पैसे मांगे गए। उन्होंने स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधि से जुड़ाव का दावा करने वाले एक व्यक्ति की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनके आरोपों के अनुसार, विरोध और दबाव के बाद निर्माणाधीन परिसर की दीवारें तोड़ दी गईं।

हालांकि, पैसे की मांग, धमकी और तोड़फोड़ के बीच प्रत्यक्ष संबंध तथा प्रत्येक संबंधित व्यक्ति की भूमिका अभी जांच से प्रमाणित होना बाकी है। इन आरोपों को स्थापित तथ्य मानने के बजाय पुलिस जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाना जरूरी है।

मामले में राजनीतिक पहचान को लेकर भी स्पष्टीकरण सामने आया। जानकारी के मुताबिक, जागृति ने एक वीडियो में स्थानीय व्यक्ति सोनू चिल्लर को पार्षद सोनू डबास समझ लिया था। बाद में उन्होंने इस गलत पहचान को स्वीकार किया। आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह ने भी पार्टी की ओर से तोड़फोड़ में भूमिका होने से इनकार किया। इसलिए किसी राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि की संलिप्तता को बिना प्रमाण स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पहुंचीं, सुरक्षा और कार्रवाई का भरोसा

मामले के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 25 अक्टूबर को जागृति मिश्रा से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा कि क्या वह इस घटना के संबंध में प्राथमिकी दर्ज कराना चाहती हैं। जागृति की सहमति के बाद पुलिस अधिकारियों को आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई करने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

मुख्यमंत्री ने जिला प्रशासन को पशु आश्रय स्थल की स्थापना में आवश्यक सहयोग देने तथा मुख्यमंत्री राहत कोष से पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का आश्वासन भी दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकों के उत्पीड़न और अधिकारों के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा तथा जांच में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।

एमसीडी के जूनियर इंजीनियर विकास कुमार गुप्ता निलंबित

मामले में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई भी हुई। 26 अक्टूबर को नगर निगम के बाहरी उत्तर क्षेत्र में भवन विभाग के जूनियर इंजीनियर विकास कुमार गुप्ता को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। उनके विरुद्ध विभागीय जांच भी शुरू की गई।

निलंबन का आदेश अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित अधिकारी ने कोई अपराध किया है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि चारदीवारी गिराने की कार्रवाई किन आदेशों के आधार पर की गई, संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका थी और निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।

इस घटनाक्रम ने नगर निगम की कार्यप्रणाली, निर्माण संबंधी नोटिस और कार्रवाई की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि तोड़फोड़ नियमानुसार की गई थी, तो उसके आदेश, नोटिस और संबंधित अभिलेख सार्वजनिक जांच के दायरे में आने चाहिए। यदि प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ, तो जिम्मेदारी तय करना प्रशासन का दायित्व है।

सबसे अहम सवाल: धमकी और पैसे मांगने वालों पर एफआईआर हुई या नहीं?

इस पूरे प्रकरण में विभागीय निलंबन और आपराधिक कार्रवाई को अलग-अलग समझना जरूरी है। मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की खबरें प्रकाशित हुई हैं। पुलिस द्वारा संबंधित व्यक्ति की भूमिका की जांच शुरू किए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई है।

लेकिन 28 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार धमकी और कथित धन मांगने के आरोपों में दर्ज प्राथमिकी का नंबर, दर्ज होने की तारीख अथवा उसकी प्रमाणित प्रति की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए यह कहना कि आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है या गिरफ्तारी हो गई है, उपलब्ध प्रमाणों से पुष्ट नहीं है।

अब पुलिस और प्रशासन से अपेक्षा है कि शिकायत पर हुई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करें। प्राथमिकी दर्ज हुई है तो उसका विवरण और संबंधित धाराएं सामने आएं। यदि अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है, तो उसका कारण स्पष्ट किया जाए। साथ ही तोड़फोड़ के आदेश, कथित धमकियों और पैसे की मांग से जुड़े साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

सवाल बेजुबानों के आश्रय का ही नहीं, जवाबदेही का भी

जागृति मिश्रा का मामला केवल एक निर्माणाधीन दीवार टूटने तक सीमित नहीं है। यह घायल और बेसहारा पशुओं की देखभाल के लिए जुटाए गए संसाधनों, नागरिकों की सुरक्षा, नगर निगम की कार्रवाई और शिकायतों पर पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा विषय है।

मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप, पांच लाख रुपये की सहायता के आश्वासन और जूनियर इंजीनियर के निलंबन से प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई जरूर सामने आई है। लेकिन प्रकरण का अंतिम निष्कर्ष तभी निकलेगा, जब तोड़फोड़ के कारणों, कथित धमकी और धन मांगने के आरोपों की जांच पूरी हो तथा जिम्मेदार पाए जाने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हो।

अब निगाहें दिल्ली पुलिस की अगली कार्रवाई पर हैं—क्या शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज हुई, क्या आरोपों के समर्थन में साक्ष्य जुटाए गए और क्या तोड़फोड़ के लिए जिम्मेदार लोगों की भूमिका जांच में स्पष्ट हुई? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि मामले में प्रशासनिक कार्रवाई के साथ आपराधिक जवाबदेही भी सुनिश्चित हुई है या नहीं।

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