क्या है राइट टू डिसकनेक्ट बिल?, लोकसभा में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने किया है पेश
नई दिल्ली। एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में राइट टू डिसकनेक्ट प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है। ये बिल दफ्तरों में काम करने वालों के लिए अहम है। सबकी नजर इस पर है कि क्या केंद्र सरकार सुप्रिया सुले के राइट टू डिसकनेक्ट बिल के पक्ष में अपनी राय देती है। अगर ये बिल संसद से पास हो गया, तो करोड़ों कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी। उनको अपनी प्राइवेट लाइफ भी जीने का मौका मिलेगा। वैसे प्राइवेट मेंबर बिल संसद से पास नहीं होते। सरकारें इस बिल के बारे में सिर्फ अपनी राय देती हैं।
सुप्रिया सुले की तरफ से पेश राइट टू डिसकनेक्ट बिल में कहा गया है कि दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों की भलाई के लिए अथॉरिटी का गठन किया जाएगा। ये अथॉरिटी कर्मचारियों के अधिकारों का संरक्षण करेगी। बिल में प्रावधान है कि कर्मचारियों के हित में बनाई जाने वाली अथॉरिटी गाइडलाइन तय करेगी। साथ ही संस्थानों के प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच विवादों को भी हल करेगी। इस बिल में ये अहम प्रावधान भी है कि काम के घंटे पूरे करने के बाद कर्मचारियों को बॉस की तरफ से किए गए फोन या ई-मेल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा। अगर वे काम खत्म कर घर जाने के बाद बॉस का फोन नहीं उठाते या ई-मेल का जवाब नहीं देते, तो कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकेगी।
एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले का कहना है कि बेहतर जीवन और स्वस्थ वर्क लाइफ के बीच बैलेंस बनाने के लिए वो ये बिल लाई हैं। सुप्रिया सुले के मुताबिक आज के डिजिटल कल्चर की वजह से जीवन और वर्क लाइफ बैलेंस को बरकरार रखने में कर्मचारियों को दिक्कत होती है। सुप्रिया सुले ने राइट टू डिसकनेक्ट के अलावा दो और बिल भी पेश किए हैं। उनसे पहले कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कर्मचारियों की भलाई के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था। जिसमें काम के घंटे तय करने और राइट टू डिसकनेक्ट के प्रावधान उन्होंने रखे हैं। थरूर का कहना है कि भारत में 51 फीसदी कर्मचारी हर हफ्ते औसत 49 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। इनमें से 78 फीसदी का कहना है कि उनको दिक्कत होती है।
