महाराष्ट्र की सत्ता गंवाई, अब उद्धव ठाकरे के सामने है शिवसेना का सिंबल बचाए रखने का संकट
मुंबई। करीब ढाई साल सरकार चलाने के बाद आखिरकार उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र की सत्ता से हाथ धोना पड़ा है, लेकिन एक नया संकट उनके सामने अब बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। चुनौती है शिवसेना से भी कहीं हाथ न धोना पड़े। हालांकि, उद्धव ठाकरे ने बुधवार को अपने आखिरी बयान में दावा किया कि शिवसेना उनसे कोई नहीं छीन सकता, लेकिन पार्टी गंवाने का संकट उनके सामने है, ये बात राजनीति के जानकार मानते हैं। इसकी वजह ये है कि उद्धव के ही करीबी रहे एकनाथ शिंदे। एकनाथ शिंदे ने पार्टी के विधायकों में इतनी जबरदस्त सेंध लगाई है, कि थोड़ी और कोशिश वो कर लें, तो ठाकरे परिवार को शिवसेना का सिंबल यानी चुनाव चिन्ह गंवाना पड़ सकता है।
साल 2019 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना के कुल 55 विधायक चुनकर आए थे। इनमें से एकनाथ शिंदे ने 39 विधायक तोड़ लिए हैं। टूटे विधायकों में 8 मंत्री भी हैं। वहीं, अंदरखाने की खबर ये है कि शिवसेना के 17 में से 12 विधायक शिंदे के साथ हैं। अगर ये सच है, तो सांसदों में भी बहुमत उद्धव ठाकरे के पास नहीं है। अगर एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के ज्यादातर जिलाध्यक्षों, मेयर समेत अन्य नेताओं को अपने साथ इकट्ठा कर लिया और चुनाव आयोग में शिवसेना के सिंबल को हासिल करने का दावा ठोका, तो उद्धव ठाकरे के सामने पार्टी गंवाने का संकट और बड़ा हो जाएगा।
अब आपको बताते हैं कि अगर शिंदे गुट ने ज्यादातर शिवसेना प्रभारियों और नेताओं को अपने पाले में खींच लिया, तो चुनाव आयोग क्या करेगा। चुनाव आयोग ऐसे मामलों में चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) नियम 1968 के पैराग्राफ 15 के हिसाब से फैसला करता है। चुनाव आयोग में पार्टी के पदाधिकारी और चुने हुए प्रतिनिधियों को लिखित में देना होता है कि वो किसके साथ हैं। फिर आयोग देखता है कि चुने हुए विधायक और सांसद किस गुट के साथ हैं। जिस गुट के साथ ज्यादातर चुने हुए जनप्रतिनिधि और पदाधिकारी होते हैं, उसके पक्ष में चुनाव आयोग फैसला सुनाता है।
