June 25, 2026

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Bindeshwar Pathak: दुल्हन को रोता देख शुरू किया ‘सुलभ मिशन’, ‘टॉयलेट मैन’ ने महज 75 रूपये में एक कमरे से की थी शुरुआत

नई दिल्ली। भारत में टॉयलेट क्रांति के जनक कहे जाने वाले सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक और लोकप्रिय सोशल वर्कर बिंदेश्वर पाठक का मंगलवार को हार्ट अटैक आने से दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। बिंदेश्वर पाठक 80 वर्ष के थे। भारत में पाठक लोगों के बीच ‘स्वच्छता सांता क्लॉज’ के नाम से प्रसिद्ध थे। कई लोग उन्हें भारत का ‘टॉयलेट मैन’ के नाम से भी बुलाते हैं। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पाठक ने सुबह सुलभ इंटरनेशनल कार्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराया और गिर गए। तुरंत उठाकर उन्हें एम्स ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

कौन थे बिंदेश्वर पाठक?

बिंदेश्वर पाठक एक सोशल वर्कर थे। जिन्होनें 1970 में सुलभ इंटरटेशनल की स्थापना की, जिसका उद्देश्य खुले में शौच और अस्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों को खत्म करना था। आगे चलकर ये सुलभ नाम सार्वजानिक शौचालयों की पहचान बन गया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप सुलभ शौचालय की दिशा में क्रन्तिकारी काम किए गए। सस्ते टॉयलेट सिस्टम बनाए गए। जिससे लाखों लोगों का जीवन स्वस्थ्य और स्वच्छ हो पाया।

पाठक की ये मुहीम के पीछे हाथ से मैला ढोने की कुरीति को मिटाना और उन लोगों के जीवन को ऊपर उठाना था। पाठक ने विधवाओं के लिए भी सुलभ पहल शुरू की थी, जिसका उद्देश्य उन्हें सभी प्रकार के अभावों, प्रतिबंधों और अपमानों से मुक्ति दिलाना था।

’75 रुपए से सुलभ इंटरनेशनल की नींव रखी’

बिंदेश्वर पाठक ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि – ‘उन्होंने ये सुलभ मिशन की शुरुआत करने के लिए 9 लोगों से चर्चा की थी। उस समय सभी लोगों की जेबों में किसी के पास 5 तो किसी के पास 7 रुपए थे। कोई 10 रुपए लिए था। इकट्ठा किए तो कुल 75 रुपए हुए। न कोई साधन, न ही कोई पैरवी, ऐसी हालत में एक कमरे से शुरू हुआ सुलभ देखते-देखते भारत के स्वछता मिशन का पर्याय बन गया।

कभी किसी दुल्हन को मैला उठाने की बात पर रोते देखा तो कभी किसी बच्चे पर सांड के हमला करने के बाद लोगों का उसे इसलिए नहीं बचाना क्योंकि वो वाल्मीकि कॉलोनी (निचली जाती) से था। ऐसे घटनाओं ने पाठक के कलेजे को चीर कर रख दिया था और उन्होंने कसम खाई थी कि वो महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करेंगे और लोगों को इस कलंक से मुक्ति दिलाने का कार्य करेंगे। वाकई पाठक का ये काम सराहनीय रहा। भारत के स्वछता मिशन का जब भी जिक्र होगा बिंदेश्वर पाठक का नाम सबसे पहले लिया जाएगा।

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