जजों पर बिना सबूत भ्रष्टाचार का लगाया था आरोप, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शख्स को अवमानना का दोषी ठहराकर लगाया 2000 रुपए जुर्माना
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के निराधार आरोप लगाने वाली शिकायत भेजने के लिए एक शख्स को आपराधिक अवमानना का दोषी माना है। इस व्यक्ति ने साल 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों के खिलाफ शिकायत दी थी। देवेंद्र कुमार दीक्षित की शिकायत और संबंधित अभिलेखों पर विचार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस बृजराज सिंह की बेंच ने पाया कि आरोपी ने जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के तुच्छ और निराधार आरोप लगाए। कोर्ट ने कहा कि ये आरोप बिना किसी आधार या सबूत के थे। जो अवमानना संबंधी 1971 के कानून की धारा 2(सी) के तहत कोर्ट की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले और उसके अधइकार को कम करने वाले थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिनको आपराधिक अवमानना का दोषी पाया, उनकी वृद्धावस्था और पहली बार अपराध के तथ्य को ध्यान में रखते हुए सिर्फ 2000 रुपए का जुर्माना लगाया। ये जुर्माना दोषी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के रजिस्ट्रार के पास 1 महीने में जमा करना होगा। अगर जुर्माना न अदा किया गया, तो संबंधित दोषी को एक हफ्ते के साधारण कारावास का दंड भुगतने का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने कहा कि अवमानना करने वाले ने अप्रैल 2016 में एक शिकायत प्रस्तुत की। इसमें आरोप लगाया गया कि उसकी ओर से दाखिल रिट याचिका पर फैसला लेते समय हाईकोर्ट के जजों ने एक वरिष्ठ वकील के जरिए भ्रष्ट, बेईमान और देशद्रोही अधिकारियों के साथ मिलकर याचिका को खारिज कराने के लिए पैसे लिए।
संबंधित शख्स ने ये दावा भी किया कि इस कथित सौदे के तहत सुनवाई के पहले दिन ही याचिका को लागत के साथ खारिज कर दिया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने जून 2016 में इस शिकायत का संज्ञान लिया और मामले पर उचित कार्यवाही शुरू करने के लिए संबंधित बेंच को भेज दिया। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवेंद्र कुमार दीक्षित को अवमानना का नोटिस दिया। शिकायत देने वाले शख्स ने जवाब दाखिल करने के लिए वक्त मांगा और फिर अवमानना की कार्यवाही पर प्रारंभिक आपत्ति भी जताई। इस आपत्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2022 में खारिज कर दिया। इसके बाद दोषी ने दिसंबर 2024 में जवाब दिया और फिर समीक्षा कर कोर्ट ने जनवरी 2025 में देवेंद्र कुमार दीक्षित पर आरोप तय किए। जिसके बाद काउंसलर ने अपने केस के समर्थन में राष्ट्रपति भवन से कवर लेटर मांगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जजों पर भ्रष्टाचार के आरोपों में सबूत नहीं थे और राष्ट्रपति भवन से कवर लेटर मांगना भी अनुचित था।
