लिपुलेख दर्रे के बारे में नेपाल के दावे पर भारत ने जताई सख्त आपत्ति, कहा- ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों के आधार पर मान्य नहीं
नई दिल्ली। लिपुलेख दर्रे के मामले में नेपाल के दावे को भारत ने सख्त आपत्ति जताते हुए खारिज किया है। भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे से फिर व्यापार शुरू करने पर सहमति जताई थी। इसके बाद नेपाल की सरकार ने लिपुलेख और इससे जुड़े इलाकों को अपना बताते हुए आपत्ति की थी। साल 2020 से अचानक नेपाल ने लिपुलेख दर्रे और आसपास के इलाकों को अपना बताने की शुरुआत की थी। नेपाल ने अपना नक्शा और संविधान भी संशोधित कर इन तीन भारतीय इलाकों को खुद का बताया था। भारत ने लिपुलेख दर्रे और आसपास के इलाकों को हमेशा अपना बताया और नेपाल के कदम को एकतरफा ठहराया है।
विदेश मंत्रालय प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने लिपुलेख दर्रे पर भारत के रुख के बारे में कहा कि यहां से साल 1954 से चीन के साथ व्यापार जारी है। लंबे समय से लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन कारोबार कर रहे हैं। कोविड महामारी और अन्य कारणों से लिपुलेख दर्रे के रास्ते भारत और चीन का व्यापार बाधित हुआ था। अब फिर भारत और चीन ने लिपुलेख के रास्ते कारोबार करने पर सहमति जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि नेपाल के क्षेत्रीय दावे न्यायसंगत भी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों के आधार पर भी नेपाल का दावा मान्य नहीं है। भारतीय विदेश मंत्रालय प्रवक्ता ने नेपाल के दावों को बनावटी और एकतरफा आगे बढ़ने वाला बताया। उन्होंने कहा कि लिपुलेख और अन्य इलाकों पर नेपाल का दावा मंजूर नहीं है।
भारत ने कहा है कि वो कूटनीति के जरिए मुद्दे को सुलझाना चाहता है। बता दें कि भारत और चीन के विदेश मंत्रियों ने लिपुलेख दर्रे के जरिए दोनों देशों के बीच व्यापार शुरू करने का फैसला किया था। इसके एक दिन बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा महाकाली नदी के पूर्व में हैं। ये ऐतिहासिक रूप से नेपाल का हिस्सा हैं। नेपाल के इसी दावे को भारत गलत बताता है। भारत सरकार का कहना है कि नेपाल ने एकतरफा तौर से तीनों इलाकों को अपना बताना शुरू किया। खास बात ये है कि लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा पर नेपाल ने पहले कभी भी दावा नहीं किया था।
