ठेले पर पिता का शव: महराजगंज में मानवता और प्रशासन पर सवाल
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रविन्द्र बंसल प्रभारी यूपी, यूके / हिंद फोकस न्यूज़
ठेले पर पिता का शव: महराजगंज में मानवता और प्रशासन पर सवाल
गरीबी की मार झेलते दो नन्हे भाइयों को नहीं मिला पिता के अंतिम संस्कार का साधन, तीन दिन तक घर में पड़ा रहा शव, मदद को तरसते रहे मासूम
महाराजगंज । जनपद के नौतनवा कस्बे के राजेंद्रनगर वार्ड से एक हृदयविदारक घटना सामने आई। 50 वर्षीय लव कुमार पटवा, जो फेरी लगाकर चूड़ी आदि बेचकर परिवार पालते थे, का निधन हो गया। परिवार में दो ही बेटे—राजवीर (14) और देवराज (10)—बचे। माँ और बहन का पहले ही देहांत हो चुका था।
गरीबी इतनी गहरी थी कि पिता के अंतिम संस्कार के लिए बच्चों के पास पैसे तक नहीं थे। मजबूरी में शव घर में तीन दिन तक पड़ा रहा। दुर्गंध और सामाजिक उपेक्षा से परेशान होकर बच्चों ने शव को ठेले पर रखा और रास्तों पर भटकते हुए अंतिम संस्कार का उपाय ढूँढने लगे।
समाज और प्रशासन की उदासीनता
राहगीरों की आँखें नम हुईं, पर मददगार हाथ बहुत देर तक आगे नहीं बढ़े। इसने समाज और प्रशासन दोनों की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जब इंसानियत जागी
छपवा तिराहे पर वार्ड नंबर दो के सभासद प्रत्याशी राशिद कुरैशी और वार्ड 17 के सभासद वारिस कुरैशी ने मासूम भाइयों की हालत देखी। उन्होंने तुरंत चारपहिया वाहन की व्यवस्था की और शव को श्मशान घाट पहुँचाकर हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कराया।
यह कदम दिखाता है कि जब प्रशासन चुप रहा, तब समाज के कुछ लोग आगे आए और मानवता की मिसाल पेश की।
प्रशासन पर सवाल
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र पर गहरी चोट है। सवाल उठता है—
अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत जरूरत में प्रशासन कहाँ था?
समाज कल्याण की योजनाएँ गरीब तक क्यों नहीं पहुँच पातीं?
अनाथ हुए इन बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी कौन लेगा?
ठेले पर पिता का शव लेकर भटकते मासूमों की तस्वीर न केवल आँखें नम करती है, बल्कि पूरे तंत्र से सवाल पूछती है। यह घटना चेतावनी है कि अगर गरीबी और संवेदनहीनता का समाधान नहीं हुआ तो कल ऐसे कई और दृश्य हमारे समाज को शर्मसार करेंगे।
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