‘एक भी प्रतिकूल टिप्पणी पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति हो सकती है’, जजों को गुजरात हाईकोर्ट ने सख्त संदेश दिया
गांधीनगर। गुजरात हाईकोर्ट ने सख्त संदेश देते हुए कहा है कि अगर किसी जज के खिलाफ एक भी प्रतिकूल टिप्पणी होती है या उसकी ईमानदारी पर सवाल उठता है, तो ये उसे सेवा से रिटायर करने के लिए पर्याप्त है। गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस एएस सुपेहिया और जस्टिस एलएस पीरजादा की बेंच ने 2016 में 18 सेशन जजों के साथ अनिवार्य रिटायर किए गए जज जेके आचार्य की याचिका खारिज करते हुए ये बात कही। कोर्ट ने कहा कि जज को पूरी तरह ईमानदार और उच्च नैतिक मूल्य का होना चाहिए। कोर्ट ने इसकी वजह बताई कि जज जनता के भरोसे का पद संभालता है।
गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि अनिवार्य रूप से रिटायर करना कोई सजा नहीं, जनहित में लिया जाने वाला फैसला है। अनिवार्य सेवानिवृत्ति से पहले जज को कारण बताओ नोटिस जारी करना भी जरूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ठोस सबूत के बिना भी किसी जज की सामान्य प्रतिष्ठा के आधार पर भी उसे अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया जा सकता है। अगर एक भी गोपनीय प्रतिकूल टिप्पणी या ईमानदारी संदिग्ध होने पर ऐसा फैसला हो सकता है। कोर्ट ने ये भी साफ किया कि किसी जज के प्रति ऐसा कदम पदोन्नति या उच्च वेतन स्तर के आधार पर प्रभावित नहीं किया जा सकता। जज रहे आचार्य ने हाईकोर्ट की पूर्ण कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। जिस पर हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि पूर्ण कोर्ट में सभी जजों की सामूहिक राय होती है। इस तरह के फैसले लेने में वो सर्वोच्च है। जिसकी समीक्षा सिर्फ सीमित आधार पर हो सकती है।
गुजरात हाईकोर्ट की दो जजों की बेंच ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट का भी हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जज का पद जनता के भरोसे का प्रतीक है। उसे निष्पक्ष, बौद्धिक तौर पर ईमानदार और उच्च नैतिकता वाला होना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र और कानून के शासन को मजबूत करने के लिए न्यायिक प्रणाली का मजबूत होना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई जज इन मानकों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई या जनहित में अनिवार्य सेवानिवृत्ति हो सकती है। कई बार ठोस सबूत जुटाने मुश्किल होते हैं, लेकिन हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति और पूर्ण कोर्ट का फैसला अंतिम होता है।
