‘यूएलसी घोटाला में देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे को फंसाने की कोशिश की गई’, महाराष्ट्र की पूर्व डीजीपी रश्मि शुक्ला की रिपोर्ट में सनसनीखेज आरोप
मुंबई। महाराष्ट्र में 15 जनवरी को बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव होने जा रहे हैं। इससे पहले एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है, जिससे राज्य की सियासत गर्माने के पूरे आसार हैं। महाराष्ट्र के डीजीपी पद से हाल ही में रिटायर हुईं रश्मि शुक्ला ने ये रिपोर्ट तैयार की है। न्यूज चैनल आजतक के मुताबिक पूर्व डीजीपी रश्मि शुक्ला ने रिपोर्ट में कहा है कि साल 2021 में तत्कालीन डीजीपी संजय पांडे ने उस वक्त नेता विपक्ष रहे और अब सीएम देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे को यूएलसी घोटाला में फंसाने की कोशिश की। महाराष्ट्र के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को दी गई है।
न्यूज चैनल के मुताबिक पूर्व डीजीपी रश्मि शुक्ला की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 में महाराष्ट्र के डीजीपी रहे संजय पांडे ने ठाणे के डीसीपी रहे लक्ष्मीकांत पाटिल और एसीपी रहे सरदार पाटिल को निर्देश दिया था कि वे 2016 के यूएलसी घोटाला मामले में देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे को बिल्डरों से अवैध वसूली का आरोपी दिखाएं। रिपोर्ट के मुताबिक एसीपी सरदार पाटिल पर ये दबाव भी बनाया गया कि वो देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे को गिरफ्तार करें। यूएलसी घोटाला में आरोपी संजय पुनामिया ने जांच एजेंसियों को एक ऑडियो क्लिप दी। पुनामिया के मुताबिक इस ऑडियो में तत्कालीन डीजीपी संजय पांडे, डीसीपी लक्ष्मीकांत पाटिल और एसीपी सरदार पाटिल के बीच बातचीत है।
पूर्व डीजीपी रश्मि शुक्ला की रिपोर्ट में कोपरी थाने में दर्ज केस के बारे में भी कहा गया है। आरोप है कि डीसीपी लक्ष्मीकांत पाटिल ने पुनामिया और सुनील जैन से पूछताछ की। जबकि, पाटिल यूएलसी घोटाला के जांच अधिकारी भी नहीं थे। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि पूछताछ में संजय पुनामिया पर दबाव डाला गया कि वो बताएं कि देवेंद्र फडणवीस ने बिल्डरों से वसूली की। यूएलसी यानी अर्बन लैंड सीलिंग घोटाला मामला इससे संबंधित 1976 के कानून से संबंधित है। अर्बन लैंड सीलिंग कानून में 500 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन वाले शहरों के इलाके सरकार अधिग्रहित करती थी। यूएलसी घोटाला में जमीन के मालिकों ने फर्जी दस्तावेज बनाए। जिससे अधिग्रहण से जमीन बचाई जा सके और कम मुआवजा ले सकें। अर्बन लैंड सीलिंग के तहत गलत सर्टिफिकेट जारी हुए। इससे जमीनों को सरकार की पहुंच से बाहर कर लिया गया और खजाने को बहुत नुकसान हुआ। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे सबसे बड़ा जमीन घोटाला बताया था।
