अभाव और जागरूकता ही मनुष्य को बनाती है महापुरुष: अंतर्राष्ट्रीय कथावाचक अनमोल श्री जी
अध्यात्म की पावन धरा पर इन दिनों भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी बह रही है। परम पूज्य, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कथा व्यास श्रद्धेय अनमोल श्री जी के मुखारविंद से प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा महायज्ञ के विशेष सत्र में आस्था का ऐसा महासैलाब उमड़ा कि पूरा पंडाल छोटा पड़ गया। चारों ओर से केवल राधे-राधे की गूंज और ठाकुर जी के जयकारों से संपूर्ण वातावरण अलौकिक और दिव्य हो उठा।
कथा व्यासपीठ से धर्म की साक्षात प्रतिमूर्ति अनमोल श्री जी ने आज के युग में शिक्षा, संस्कार और सफलता के गूढ़ रहस्यों पर से पर्दा उठाया। उन्होंने पंडाल में उपस्थित जनमेदिनी को झकझोरते हुए कहा कि मानव जीवन की सार्थकता केवल धन कमाने में नहीं, बल्कि श्रेष्ठ शिक्षा और उच्च संस्कारों को धारण करने में है।
इतिहास गवाह है, कामयाबी के शिखर पर केवल दो ही तरह के लोग पहुंचते हैं
परम पूज्य अनमोल श्री जी ने अपने ओजस्वी और मर्मस्पर्शी प्रवचन में जीवन प्रबंधन का महामंत्र देते हुए बताया कि इस चराचर जगत में सफलता और श्रेष्ठता के शिखर पर केवल दो ही तरह के लोग विराजमान होते हैं। या तो वो जो पूरी तरह जागरूक हैं, या फिर वो जो घोर अभाव में जिए हैं।
पहले वो जो जागरूक हैं: अनमोल श्री जी ने कहा कि जो मनुष्य अपने समय, अपने कर्तव्य और अपने धर्म के प्रति जागरूक रहता है, उसे कोई भी ताकत पीछे नहीं धकेल सकती। विवेकशील और जागरूक व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लिए सही रास्ता चुन लेता है।
दूसरे वो जो अभाव में हैं: अनमोल श्री जी ने अत्यंत भावुक कर देने वाले शब्दों में कहा कि जीवन में अभाव कोई अभिशाप नहीं, बल्कि ईश्वर का दिया हुआ वह वरदान है जो मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है। जब व्यक्ति के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता और पाने के लिए पूरा आसमान बाकी होता है, तब उसके भीतर की तड़प और संकल्प उसे शून्य से शिखर पर ले जाती है। अभाव ही मनुष्य को तपाकर कुंदन बनाता है।
शिक्षा के बिना मनुष्य का जीवन पशु समान
अनमोल श्री जी ने सनातन परंपराओं और शास्त्रों का हवाला देते हुए शिक्षा के महत्व पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि विद्या ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण और गुप्त धन है। जिस समाज और परिवार में शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती है, वहां दरिद्रता और अज्ञानता कभी टिक नहीं सकती। उन्होंने माता-पिता से आह्वान किया कि वे अपने बच्चों को भौतिक संपदा भले ही कम दें, लेकिन उन्हें उच्च शिक्षा और सनातन के संस्कार अवश्य दें।
भक्ति के सागर में डूबा समूचा पंडाल, भजनों पर थिरके श्रद्धालु
कथा के उत्तरार्ध में जब अनमोल श्री जी ने अपनी सुमधुर और जादुई आवाज में ठाकुर जी की बाल लीलाओं का वर्णन किया और दिव्य भजनों की अमृत वर्षा की, तो पंडाल में उपस्थित लाखों भक्त सुध-बुध खोकर झूमने लगे। क्या अबाल, क्या वृद्ध, हर कोई कान्हा की भक्ति के रस में सराबोर होकर नृत्य करने लगा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात गोकुल धाम धरती पर उतर आया हो।
कथा के विश्राम काल में मुख्य यजमानों सहित विशिष्ट अतिथियों ने श्रीमद् भागवत महापुराण की महाआरती उतारी। इसके पश्चात उपस्थित समस्त जनसमुदाय में छप्पन भोग के महाप्रसाद का वितरण किया गया। इस महाआयोजन की दिव्यता और महाराज श्री के वचनों की छाप भक्तों के दिलों पर अमिट हो गई है।
