March 11, 2026

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ब्रांडेड दवा के नाम पर इस तरह लुट रहे हैं आप, जेनेरिक दवा काम भी करेगी और जेब पर भी नहीं बनेगी बोझ

नई दिल्ली। बीमार होना किसी को अच्छा नहीं लगता और उस पर डॉक्टर महंगी दवा लिख दे, तो वो और भी खराब लगता है। दवा खरीदने में जेब ढीली हो जाती है, मरीज के परिजन परेशान हो जाते हैं। फिर भी डॉक्टर ने लिखा है, तो खरीदना उनकी मजबूरी होती है। क्या आप जानते हैं कि ब्रांडेड दवा की जगह आप जेनेरिक दवाइयां खरीदें, तो वे काम भी ब्रांडेड दवा जैसी ही करती हैं और जेब पर बोझ भी नहीं डालतीं।

पहले कुछ ब्रांडेड और जेनेरिक दवाइयों की कीमत में अंतर भी देख लेते हैं। सिप्ला की ओमनिक्स-ओ एंटीबायटिक दवा 175 रुपए की है। यही कंपनी इसी दवा को सेफिक्स-ओ नाम से भी बनाती है। उसकी कीमत 220 रुपए है। जबकि, यही दवा जेनेरिक खरीदें, तो 10 टैबलेट का पत्ता महज 52 रुपए का मिल जाता है। कोरोना के दूसरी लहर में खासकर ब्रांडेड दवाइयों को डॉक्टर लिख रहे थे। अब जरा इनके जेनेरिक सब्सीट्यूट के रेट भी देख लीजिए। विटामिन सी विद जिंक की ब्रांडेड दवा 140 रुपए पत्ता है। जेनेरिक में इसकी कीमत 60 रुपए है। यानी 80 रुपए कम। विटामिन डी के चार कैप्सूल अगर ब्रांडेड खरीदें, तो 130 रुपए की होती हैं। जेनेरिक विटामिन डी के चार कैप्सूल मात्र 20 रुपए में मिलते हैं। डॉक्सीसाइक्लिन की ब्रांडेड दवा 90 रुपए और जेनेरिक 9 रुपए की है। इसी तरह एजिथ्रोमाइसिन जेनेरिक में 90 रुपए की 10 टैबलेट मिलती हैं। जबकि, ब्रांडेड में 10 टैबलेट एजिथ्रोमाइसिन 240 रुपए की होती हैं।

रेमडेसिविर नाम की जान बचाने वाली दवा 5400 रुपए का एक वायल हेट्रो नाम की कंपनी बेचती है। इसी दवा के 6 इंजेक्शन कैडिला सिर्फ 4800 रुपए में देती है। मेरोपेनेम की 10 वायल की कीमत 36000 भी है, तो 5000 रुपए भी। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का कहना है कि ब्रांड के नाम पर कीमत ज्यादा वसूलने का चलन है। सरकार को ब्रांडेड दवा बेचने वाली कंपनियों पर दबाव डालना चाहिए और जेनेरिक दवाइयों का चलन बढ़ाने की जरूरत है।

बहरहाल, अब से जब भी दवा खरीदें तो प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र जाकर जरूर पता कर लें कि डॉक्टर ने जो ब्रांडेड दवा लिखी है, उसका जेनेरिक वर्जन मिल रहा है या नहीं। घबराइए मत, जेनेरिक भी उतना ही काम करती है, जितनी ब्रांडेड दवा। साथ ही ये आपकी जेब पर भारी भी नहीं पड़ेगी।

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