चुनी हुई सरकार को राज्यपाल के विवेकाधिकार पर कैसे छोड़ा जा सकता है? सीजेआई ने की टिप्पणी
नई दिल्ली। राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर फैसला लेने के लिए टाइमलाइन सेट करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई ने टिप्पणी करते हुए सॉलिसिटर जनरल से सवाल किया। राष्ट्रपति की ओर से दाखिल रेफरेंस पर सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि विधेयकों को रोके रखने के लिए राज्यपाल को पूरी शक्ति नहीं दी जा सकती। जो सरकार जनता के वोट से चुन कर बनी है उसे राज्यपाल के विवेकाधिकार पर कैसे छोड़ा जा सकता है। सीजेआई गवई ने आगे कहा कि विधेयकों पर फैसला न लेना और उनको रोक कर रखना राज्यपाल और विधानसभा दोनों के हित में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच इस केस पर सुनवाई कर रही है। इसी साल अप्रैल में तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने फैसला सुनाते हुए राज्यपालों और राष्ट्रपति को किसी विधेयक पर फैसला करने के लिए समयसीमा तय कर दी थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि राष्ट्रपति को तीन महीने और राज्यपाल को एक महीने के अंदर किसी विधेयक पर निर्णय ले लेना चाहिए। इसके बाद राष्ट्रपति की तरफ से अनुच्छेद 143 (1) के तहत रेफरेंस भेज कर सुप्रीम कोर्ट से कुछ सवाल किए गए। राष्ट्रपति के इसी रेफरेंस पर अब पांच जजों की बेंच इस केस पर सुनवाई कर रही है।
इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामा में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट अगर इस प्रकार से दखल देगा तो इससे संवैधानिक अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वहीं सॉलिसिटर जनरल ने संविधान के आर्टिकल 200 का हवाला देते हुए राज्यपाल के अधिकारों की बात की। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति सीधे निर्वाचित नहीं है उसे कमतर नहीं आका जा सकता। राज्यपाल को यह अधिकार प्राप्त है कि वो किस बिल को मंजूरी दें और किसे रोक कर रखें या विचार के लिए राष्ट्रपति के पास भेजें।
