बेंगलुरू

कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य में एससी और एसटी के बढ़ाए गए आरक्षण को रद्द किया, संविधान के इन अनुच्छेदों का बताया उल्लंघन

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बेंगलुरु। कर्नाटक में एससी और एसटी के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने के कानून को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि बढ़ी हुई सीमा 50 फीसदी तक ही आरक्षण देने का उल्लंघन करती है। कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस केएस हेमलेखा की बेंच ने कहा कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शिक्षण संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के तहत सेवाओं में नियुक्ति या पदों) एक्ट 2022 की धारा 3 संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के खिलाफ है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कानून की धारा 4 को भी असंवैधानिक बताया। इस धारा के तहत कर्नाटक सरकार की नौकरी में एससी और एसटी के लिए ज्यादा आरक्षण का प्रावधान किया गया था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन बताया। कर्नाटक में एससी और एसटी का आरक्षण बढ़ाए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल हुई थीं। एक याचिका डॉ. आंबेडकर अनुसूचित जाति फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुमार मित्रा और दूसरी सिविल इंजीनियरिंग स्नातक सागर एचआर, प्रज्ज्वल कुमार डी और पुरुषोत्तम गौड़ा जीएम ने दाखिल की थी।

दूसरी याचिका दाखिल करने वाले तीनों लोगों ने वृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। याचिकाओं में कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। कर्नाटक सरकार ने एससी, एसटी और ओबीसी के कुल आरक्षण को 56 फीसदी कर दिया था। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में तय किया था कि आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट और कई हाईकोर्ट ने इससे ज्यादा आरक्षण दिए जाने को कई बार रद्द किया था। कर्नाटक में आरक्षण बढ़ाने का कानून बसवराज बोम्मई के सीएम रहते बना था। गवर्नर ने जनवरी 2023 को इसे मंजूरी दी थी। एससी और एसटी के प्रतिनिधित्व संबंधी सिफारिश के बाद कानून बनाया गया था।

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