तलाकशुदा महिला और उसके बच्चे के गुजारा भत्ता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
प्रयागराज। तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और ऐसे में एलिमनी यानी गुजारा भत्ता के लिए महिलाओं का कोर्ट जाना भी हो रहा है। कानून के मुताबिक अगर तलाकशुदा महिला कोई काम करती है और जीविका अच्छे से चला सकती है, तो उसके पूर्व पति को गुजारा भत्ता के लिए हर महीने या एकमुश्त रकम नहीं देनी होगी, लेकिन अगर महिला कुछ नहीं करती, तो पति को गुजारा भत्ता देना होता है। आमतौर पर महिलाएं बहुत ज्यादा गुजारा भत्ता मांगती हैं। जिस पर तलाकशुदा पुरुष परेशान होते हैं अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता के एक मामले में सुनवाई करते हुए अहम बात कही है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह ने गुजारा भत्ता के मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि गुजारा भत्ते की रकम न तो इतनी ज्यादा होनी चाहिए कि पति के लिए असहनीय बोझ बन जाए और न ही इतनी कम हो कि पत्नी और बच्चे अभाव में जिंदगी बिताने के लिए मजबूर हों। इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की ओर से एक महिला और बच्चे के गुजारे के लिए तय 16000 रुपए की रकम को घटाकर 8000 रुपए कर दिया। इस मामले में तलाकशुदा अनिल कुमार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। यूपी के फतेहपुर स्थित फैमिली कोर्ट ने 22 अप्रैल 2025 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत पति को हर महीने 10000 और बेटे को 6000 रुपए गुजारा भत्ता देने का आदेश सुनाया था।
अनिल कुमार ने फतेहपुर फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दी थी। अनिल के वकील ने हाईकोर्ट में कहा कि उनके मुवक्किल की महीने की आय 30 से 32 हजार रुपए है। हर महीने 16000 रुपए देना आय का करीब 50 फीसदी है। वकील ने तर्क दिया कि इतना गुजारा भत्ता बहुत ज्यादा है। अनिल कुमार और महिला के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि आम तौर पर पति की शुद्ध आय का करीब 25 फीसदी गुजारा भत्ता ठीक माना जा सकता है। इसी के आधार पर पति के आय से महिला और बच्चे के लिए हर महीने 8000 रुपए देने का इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया।
