June 27, 2026

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‘इस्लाम अपनाने वाला सिर्फ मुस्लिम’, धर्मांतरण के बाद आरक्षण के मसले पर मद्रास हाईकोर्ट का अहम फैसला

मदुरै। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने धर्मांतरण के बाद आरक्षण मिलने के मसले पर अहम फैसला सुनाया है। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि इस्लाम अपनाने वाला सिर्फ मुस्लिम होगा। वो किसी खास पिछड़े मुस्लिम समुदाय का दावा नहीं कर सकता। तमिलनाडु सरकार के 2024 के उस आदेश को भी मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस पीबी बालाजी की बेंच ने असंवैधानिक बताया, जिसमें धर्मांतरण करने वालों को मुस्लिमों में पिछड़ा का दर्जा दिया गया था।

तूतीकोरिन जिले में हिंदू परिवार में जन्मा शख्स 2015 में धर्मांतरण कर मुस्लिम बन गया था। उसने अपना नाम भी बदल लिया। इसके बाद उस शख्स ने खुद को मुस्लिम लेब्बई समुदाय का बताया और इससे संबंधित सर्टिफिकेट का आवेदन किया। तहसीलदार ने इस शख्स का आवेदन खारिज कर दिया। जिसके बाद उसने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच में याचिका दाखिल की थी। इस मामले में तमिलनाडु सरकार की ओर से वकील ने कोर्ट में कहा कि 2024 के आदेश के तहत सिर्फ वे लोग जो पहले पिछड़े, अति पिछड़े या अनुसूचित जाति के थे और आरक्षण का लाभ मिल रहा था, उनको इस्लाम अपनाने के बाद पिछड़ों का लाभ देने की व्यवस्था है। तमिलनाडु सरकार ने कहा कि इससे सामाजिक संतुलन नहीं बिगड़ेगा।

जस्टिस स्वामीनाथन और जस्टिस बालाजी की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की दलील को मानने से इनकार करते हुए कहा कि हिंदू से इस्लाम में जाने वाला व्यक्ति सिर्फ मुस्लिम रह जाता है। उसका सामाजिक दर्जा उस जाति से तय नहीं होता, जिसमें वो पहले था। हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे स्वीकार किया है। मद्रास हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि इस्लाम तो समानता और सामाजिक बराबरी का संदेश देता है। इस्लाम में कुछ समुदायों को पिछड़ा और कुछ को अगड़ा मानना पवित्र कुरान की मूल भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि ऐतिहासिक वजहों से मुस्लिमों में कई समुदाय जन्म से तय होते हैं, धर्मांतरण से नहीं। मद्रास हाईकोर्ट बेंच ने ये भी कहा कि सिर्फ सरकारी आदेश से कोर्ट के पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांत को नहीं बदल सकते। सरकार किसी कोर्ट के अंतिम फैसले को सिर्फ आदेश जारी कर अप्रभावी नहीं बना सकती। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु सरकार ने कई श्रेणी बनाकर इस्लाम अपनाने वालों को आरक्षण देने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि अनुसूचित जाति और ओबीसी अलग-अलग हैं।

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